September 30, 2009 by Alok Kumar
बहुत ज़माने से “शमा और परवाने” की मोहब्बत का किस्सा मैंने सुना था…मगर हर किसी ने बस परवाने के दीवानेपन को लिखा है और हमने भी बस उसके मोहब्बत में फ़ना हो जाने के जज्बे को जाना ..पर एक दिन यूँ ही एक महफिल में शमा से जो कुछ गुफ्तगू हुई तो शमा के मर्म को मैंने समझा…यदि आप तक पहुंचा दूं तो समझूगा की अब कलम इतराना सीख गयी है…
मोहब्बत तो शमा को भी थी परवाने से
इसलिए तो ज़माने से जल रही थी
बस कहती न थी, मगर उस रोज़ जो उसने देखा
कि वो परवाना सारी रात जाग उसे ताकता रहा
तो उससे रहा न गया,कर दिया इज़हार-ए-मोहब्बत
कह दी दिल कि बात,और परवाने ने
जैसे ही उसे छूने को बढाया अपना हाथ
वो जलकर राख हो गया…वो जलकर राख हो गया
इंतज़ार तो किनारों को भी था लहरों का
मगर खुद को रोके हुए थे
पर उस रोज़ जो उसने देखा कि
चली आती है कोई लहर छितिज पार से
बस एक उसके चुम्बन कि ख्वाहिश लिए
तो उसने सोचा ज़रा बढ़कर थाम लूं इसे
मगर लहर के टकराते ही, लहर का
वजूद खाख हो गया…वजूद खाख हो गया
हमारी मोहब्बत को इसकी पाखियत को
जो बनाये हुए है,वो वही है
हमारे दरमियान जो थोडी दूरी है…
दिल में है बेकरारी तभी तक,
इश्क में है खुमारी तभी तक
जब तक चंद ख्वाहिशें अधूरी है…
हर मोहब्बत के आगाज़ का
अंजाम नहीं ज़रूरी है…
अंजाम नहीं ज़रूरी है…
-रोहित अग्रवाल-
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September 14, 2009 by Alok Kumar
मिडसेम की मगाई ने ऐसा गिव अप कराया
हमने आज परीक्षा छोड़ कर हिंदी दिवस मनाया
प्रश्न-पत्र जैसे पर्येवेक्षक ने हमारी मेज पे धरा
हमने मोर्चा संभाला, ध्यान से एक एक प्रश्न पढ़ा
रात्रि जागरण कर जितना मगा था, सब याद किया
और इस प्रकार आधे घंटे का समय बर्बाद किया
फिर भी जब हमें दाल गलती नहीं दिखी
तो ख्याल आया की उम्मीद पे तो है दुनिया टिकी
इधर उधर से देख कर कुछ लगाने लगे जुगाड़
की मास्टर साब ने छीनकर पर्चा दिया फाड़
अब हम निराश हताश से पहुचे काफ़ी शैक
वहां चल रहा था भारत-लंका का मैच
कलम निकली,और भरने लगे चाय की चुस्की
कविता लिखते लिखते चेहरे पे छाने लगी मुस्की
पल भर में परीक्षा की सब चिंता छोड़ मन
करने लगा नव विचारों से कविता का स्रजन
हमें समझ गए की हिंदी में ही आनंद रस है
फील गुड होने लगा की आज आज हिंदी दिवस है
तभी पास खड़े एक सज्जन ने फ़रमाया
“भाई हिंदी को राष्ट्र भाषा क्यों बनाया?
अंग्रेजी को यदि हम राष्ट्र भाषा बनाते
प्रगतिशील और globalised कहलाते..??”
हमने अपना दिमाग दौडाया,बात इज्ज़त की थी
अकेले ही लड़कर हिंदी की डूबती लुटिया को बचाया
हमने उन्हें समझाया की अंग्रेजी की बड़ी अजीब माया
इसे सुनकर पढ़कर मैं भी हूँ बहुत बार चकराया
प्रिय को कहते हैं sweeetheart, बकवास को fart
अरे इस भाषा के लोग तो शब्दों के आभाव में जीते हैं
कभी हिरन तो कभी प्रेयसी को dear कहते हैं
भालू है बियर, उसे ही मदिरा समझ कर पीते हैं
इसी प्रकार “तुम्हारा तुम्हारी” का भेद मिटाकर
अंग्रेजों ने बस एक “your” शब्द बनाया है
अंतर ऐसा भूले की विश्व में सबसे
पहले समलैंगिकता को अपनाया है….
इसीलिए कहता हूँ हिंदी बचाओ ये वैदिक संस्कृति का आधार है
ये ज्ञान की प्रथम बौछार है….सभ्यता का प्रथम उपहार है
ये देवों का वरदान है,गीता का ज्ञान है,विचारों की खान है
प्रेम का परिधान है,सब भाषाओँ में महान है…
ये अत्त्मा है भारत माँ की..हिंदी से हिन्दुस्तान है…
-रोहित अग्रवाल-
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September 8, 2009 by Alok Kumar
उस हसीना की यादों में पूरी रात जागा था ,
और सुबह होते ही झटपट class भागा था ;
lecture में बैठे-बैठे, मैं सोने लगा था,
अपने आप पर नियंत्रण खोने लगा था ।
मगर प्यारे prof ने,ये होने नहीं दिया
पलभर के लिए भी मुझे सोने नहीं दिया ;
lecture से लौटकर बिस्तर पर सो गया,
उसके हसीं सपनों में फ़िर से खो गया ।
नींद खुली मेरी तो बारह बज रहे थे,
lan-ban होने के लक्षण लग रहे थे;
झटपट में मैंने अपना GPO खोला,
तभी किसी ने PA पर आकर बोला:
” पप्पू का जन्मदिन है, सब बंप्स लगाने आ जाओ,
उसके बाद जितना चाहो, कैंटीन में जाकर खाओ !”
पेट में चूहे कूद रहे थे भूख के कारण
GPO को छोड़ किया रुद्र रूप धारण;
फिर जाकर पप्पू को जमकर लात लगाया,
मस्ती करके कमरे में तीन बजे आया ।
ये IIT की जिन्दगी है,
नींद का नहीं यहाँ ठिकाना;
रोज-रोज ये रात्रि-जागरण,
हे ईश्वर! तू मुझे बचाना ।
जागते-जागते सोच रहा था कल के नुकसान पर ,
बड़ी मुश्किल से आया एक-एक चीज ध्यान पर;
Quiz छूटा, Lab छूटा, एक class छूट गया,
और ‘वाणी‘ का एक ‘मुलाकात‘ छूट गया ।
रोहित नाराज़ होगा, भावना नाराज़ होगी ,
पता नहीं रश्मिजी मुझसे क्या कहेगी ;
फिर मैंने सोचा कि चुप तो नहीं रहूँगा
मुझसे वे पूछेंगे तो झूठ-मूठ कह दूँगा :
Quiz था ,Lab था, एक presentation था,
एक नहीं तीन-तीन Assignment submission था;
ये IIT की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या?
साँस लेने तक की, फ़ुरसत नहीं यहाँ ;
थोडी फ़ुरसत मिली, बस यहीं आ रहा हूँ ;
आप सबको अपनी ये कविता सुना रहा हूँ ।।
-आलोक कुमार-
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September 6, 2009 by Alok Kumar
इस दिव्य प्रभात की बेला में
इक नया सा सूरज आया है ,
जग मग किरणों के पथ से
इक नया सवेरा लाया है |
यु तो कई दिन आते हैं ,
पर जाने क्यों आज
आसमा का नीचे
इक नरम नरम सी छाया है,
इक गरम गरम सी छाया है|||
इक अलसाई करवट ले रहा था,
कि रश्मि की सिकीं उँगलियों ने छुआ|
चक्षु में धुप की छीटें छिटक कर,
पैगाम दिया -उठो की चकमक सवेरा हुआ|
मैं उठा ,मुँह धोकर
रसोई की और पाँव किये,
महक के अनुरूप इक अच्छे
नाश्ते की कामना लिए,
पर ये क्या आज गृह लक्ष्मी रोज़ की
तरह कुछ बुदबुदा नहीं रही!
शिकायतों के कर्कश अलाप सुना नहीं रही!
मैं मुस्कुराया और चुप रहा ,
मन के अन्दर अचरच का एक दरिया बहा,
सोचा आज दिन कुछ अजीब है ,
या शायद रोशन मेरे नसीब हैं|
अब घर छोड़ ,में डगर पर था ,
ना फिजाओं में बस ,मोटर कार के हार्न का शोर,
ना ही दूषित धुंए का दम घोटता हिलोर ,
शांति से इसे भी पचा लिया,
फिर अचरच की उचालती गेंद को मन में कहीं दबा लिया|
अब,कार्यालय में प्रवेश हुआ,
ये सन्नाटे का इस माहोल में कैसे समावेश हुआ ?
अब दिमाग कुछ चकराने लगा,
मेरे अचरच का बाँध टूट बिखर जाने लगा ,
ये असंभव का गगन संभव की ज़मी से कैसे टकराने लगा|
मैं चिल्ला कर उठ बैठा ,
अरे देखा!बिस्तर पर था लेटा,
ओह ,तो ये वो मेरा स्वप्नों का दिवस है
जो मैं जीना चाहता हूँ ,
जो पेय कभी सतयुग में बंटता था
उसे आज कलयुग में पीना चाहता हूँ||||||||||||
-दीपशिखा वर्मा
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August 17, 2009 by Alok Kumar
क्या है सघन मेघों के उस पार,
नही जानता ।
हो सकता है अंधकार ,
या हो सकते हैं सूर्य हजार,
यही मानता ।
सत्य छुपा हो उस चोटी पर,
जो हो मेघों से भी ऊपर ।
बादल से छनती किरण थाम लूँ ,
उस चोटी को लक्ष्य मान लूँ ।
विकट सरल बाधाएं चीर कर,
पहुंचूंगा मैं जब उस चोटी पर ।
मैं निश्चय ही यह पाऊंगा ,
मैं भी एक सूर्य बन जाऊंगा ।।
-ऋषभ जैन-
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August 12, 2009 by Alok Kumar
कही से आया हवा का झोंका
तेरी ही यादो से भर गया है
गुजर के कितने करीब से फिर
वो कल हमें दूर कर गया है
……………………….
वो खुशनुमा सा दर्द देता
निरीह मासूम प्यार अब भी
मेरे हृदय में लगे है जैसे
अभी कोई घाव कर गया है
……………………
रहू अभी चुप या पूछ लू मैं
घिरा हुआ हूँ मैं उलझनों से
जो दिन तेरे साथ थे बिताने
मेरा वो हिस्सा किधर गया है
………………………….
कई दिनों से खबर नहीं है
मैं सोचता हूँ के आजमा लू
मेरे ह्रदय में वो प्यार जिन्दा
है या तेरे साथ ही मर गया है
……………………….
समझ सको तो तुम्ही बताओ
सजा उसे या मुझे मिली है
वो चैन से सो गया है लेकिन
मेरा तो आगन बिख़र गया है
…………………………..
कभी तो तू भी ठहर लिया
ऐ वक़्त बेवक्त क्यों जा रहा है
अकेले चल के मै थक गया हूँ
जरा सा लम्बा सफ़र गया है……………..
…………………….
कही से आया हवा का झोंका
तेरी ही यादो से भर गया है…………
पवन राय
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August 10, 2009 by Alok Kumar
कुछ चीजें होती है, जिनका अनजाने में ही इंतज़ार किया करते है,
कोई खामोशी से तो कोई ख़ुशी से, अपना इज़हार किया करते है…
कुदरत की इस कृति की बड़ी अजीबोगरीब दास्ताँ है,
इसे समझ पाना कभी मुश्किल, तो कभी बहुत आसान है….
जैसे “पानी की बूँद”, कहने को तो सिर्फ एक मामूली बूँद होती है,
ये बहरूपिये की तरह है, जो किसी को पहचान में नहीं आती है…
धरती की प्यास बुझाने के लिए, बरस पड़ती है आसमान से,
लहलहाते खेतों के लिए, बन के आती है सोमरस के रूप में…
समूचे गगन में हो संग हवाओं के, ये ठुमकती रहती है,
सूरज की किरणों के साथ खेल होली, ये इन्द्रधनुष बना देती है…
बारिश में पेडों के पत्तों पर, ये मोती बनकर बिखर जाती है,
फूल के अंगों पर सजकर, ये दुल्हन उसे बना देती है…
शराब की बोतल में लुढ़ककर, ना जाने कितने मयखाने सजाये है,
गम में डूबे हुए को अपना सहारा देकर, अनगिनत देवदास बनाये है…
कभी दुःख में शामिल होकर, आँख से आंसू बनकर निकल पड़ती है ,
तब आसान नहीं होता रोक पाना इसे, जब आँखे ज्वालामुखी बन जाती है…
ये उभरती है हीरे की तरह चमकती हुई, जब माथे पर पसीना बन के ,
लगता है जैसे अपनी मेहनत से जीत कर ज़ंग, हम बन गए हो बादशाह जगत के…
इतना कुछ होने पर भी हमेशा खोई रहती है किसी गुमनामी के अँधेरे में,
जैसे ये मिटा देती है अपना वजूद, डूब कर समुन्दर की गहराइयों में…
- कन्हैया लाल
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August 8, 2009 by Alok Kumar
नमस्कार !!
मैं नवीन आप सबका धोनी के स्वयंवर में स्वागत करता हूँ !!
जग के सारे बालों में
रही निराली शान है ;
वह भारत का कप्तान है,
हमारा धोनी महान है ।
इसके छक्के सबसे न्यारे
ये तो क्रिकेट की जान है ;
गांगुली के खून का प्यासा
पर युवराज का प्राण है ।
वह भारत का कप्तान है,
हमारा धोनी महान है ।।
यह तो हुआ धोनी का साधारण परिचय, अब क्या आप जानते हैं कि उन्हें लड़की कैसी चाहिए । उन्होंने ख़ुद कहा ,
दिल के करीब रखूंगा मैं
मुझे चाहिए एक ऐसी हूर,
सबकुछ जिसपे लुटा दूँ अपना
मुझे चाहिए एक ऎसी नूर ।
और उसका निजी सहायक होने के नाते दूँ कि वह बहुत ही Romantic हैं :p
भाई ग़लत मत समझिये, उनकी बातों से ऐसा लगता है !
और अब सभी लड़कियों को बता देता हूँ कि उनसे शादी करने के इतने फायदे हैं :-
रहने को अच्छा बंगला
घूमने को AC गाड़ी
ऎसी फैसिलिटी बोलो…..और कहाँ मिलेगी?
ऊंचा-लंबा कद इनका
छाए हैं मोडेलिंग में भी
ऐसी सेक्सी सूरत बोलो….और कहाँ मिलेगी?
स्पोर्ट्स बाइक पर घुमायेगा
फाइव-स्टार में डिनर देगा
ऐसी अमीर पार्टी बोलो…..और कहाँ मिलेगी?
पैसों से नहाओगी
जो चाहोगी पाओगी
ऐसी मस्त जिन्दगी बोलो…..और कहाँ मिलेगी?
तो सभी युवतियों से अनुरोध है कि वो स्वयंवर के लिए जल्द से जल्द नामांकन करवायें, ” बकरा हलाल होना चाहता है, बस कसाई की जरूरत है । “
नवीन जांगीर
प्रथम वर्ष
PS: ये लेख Freshi रचनात्मक लेखन में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है, नवीन को मेरी तरफ़ से ढेरसारीशुभकामनाएं , आगे भी वाणी और IIT के लिए ढेर सारी रचना करेंगे ऐसी आशा और विश्वास है।
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August 6, 2009 by Alok Kumar
उसमें अनंत गहराई है,
है व्याकुलता, तन्हाई है,
ढूंढ सको तो ढूंढ लो ,
एक ‘सोता‘उसमें कहीं बहता है-
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
दुनिया से बेगाना है,
दुनियादारी से अनजाना है,
अव्यक्त, उलझे भावों को,
वो कागज़ पर लिख देता है-
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
शब्दों की भी सीमायें हैं,
कविता में कुछ अंश ही आयें हैं,
सागर से निकली इन बूंदों में भी,
कितना कुछ वो कहता है ,
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
उन शब्दों को हम ना ताकें,
गर उस हलचल को पहचान सके ।
क्या कहना आख़िर वो चाहता है,
उन अर्थों को हम जान सकें,
बेचैनी, उमंग नीरवता को भी,
वो लफ्जों में कह देता है ।
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
कविता तो एक माध्यम है,
आख़िर तो कवि को पढ़ना है ।
कलम की इस सीढ़ी से,
उसके ह्रदय तक चढ़ना है ।
वहाँ पहुंचोगे तो पाओगे
एक कलकल करती सरिता है ।
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
ऋषभ जैन
प्रथम वर्ष का छात्र
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August 1, 2009 by Alok Kumar
आज होकर इस जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित,
जब जिया तब था अपरिचित , ख़ुद से और संसार से ।
जिस ज़मीं को जानता था , जिस धरम को मानता था ,
चाहता था मैं जिन्हें वो लोग भी अब हैं अपरिचित ।
अग्नि धरा आकाश से , वायु और जल की प्यास से ,
था बना कण कण जो मेरा , आज वो कण भी अपरिचित ।
मिट्टियों में खेलता था , उघरे बदन मैं दौड़ता था ,
कल्पनाओं का समंदर , आज वो बचपन अपरिचित ।
माँ की ममता ने सिखाया , गुरुजनों ने भी बताया ,
ढाई अक्षर से बना , वो प्रेम भी अब है अपरिचित ।
भूल और संज्ञान में , जो किए मैंने करम ,
उनका फल ले कर जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित ।
Posted in कविता, बिरजू | 1 Comment »