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End-sem का समय था और अचानक ही IIT के छात्रों ने google समूह पर एक-एक पंक्ति डालना शुरु किया जिसने एक कहानी का निर्माण ले लिया…आइये इस मजेदार कहानी जिसके लेखक २०-२५ रहे होंगे का आनंद उठाते हैं, दो छात्रों की लिखी हुई पंक्ति के बीच एक (………) संकेत है :

End-sem के एक दिन पहले मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था कि तभी अचानक …….मुझे बगल के कमरे से आती कुछ अजीब सी आवाजें सुनाई दी……मैं तुरंत भागता हुआ वहाँ गया तो देखा कि……कमरे में तो ताला लगा हुआ था…… कोई कैसे बंद कमरे में अपना computer खुला छोड़ सकता है ?……. मेरे दिमाग में एकाएक विचारों की आंधी चली और मुझे वहाँ हैवानी और परलौकिक शक्तियों का आभास हुआ……लेकिन एक विज्ञान के छात्र होते हुए मुझे इस बात पर विश्वास करना मुश्किल था, मगर जब उस दरवाजे के नीचे से एक के बाद एक कागज़ बाहर आने लगे तो मुझे अहसास हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है….. साहस करके मैंने उन सारे कागजों में से एक को उठाया और धीरे-धीरे पढ़ना शुरू कर दिया…….मैंने अभी कुछ ही शब्द पढ़े थे कि अचानक मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया, मैंने पलटकर देखा तो……. एक सुंदर सी कन्या श्वेत वस्त्रों में वहाँ पर खड़ी थी…….लड़कों के hostel में ये कन्या कौन थी, कहाँ से आयी थी, ये जानने के लिए मैं आतुर हो उठा था…….मैं इतना सोच ही रहा था कि सहसा एक अद्भुत पत्ता कहीं से गिरा………. उस पत्ते पर एक संदेश लिखा था …… मैंने उन अक्षरों को पढने और समझने की बहुत कोशिश की………..पर मुझे इसे पढने में कोई मज़ा नहीं रहा था, बार-बार मेरा दिल उस कन्या से बात करने के लिए मचल रहा था , और आख़िर मैंने पूछ ही लिया…….. हे सुन्दरी!! तुम कोई स्वप्न हो या वास्तविकता? …..उत्तर में उस कन्या ने बस इतना कहा कि ही मैं पूर्ण रूप से वास्तविक हूँ और ही मैं पूर्ण रूप से स्वप्न…… मैंने उसकी उलझी हुई बातों से तनिक ध्यान हटाकर उस पत्ते में लिखे संदेश को पढ़ा…… उसमें लिखा था कि वो युवती जो तुम्हारे सामने खड़ी है, अरे यह क्या ? उस पत्ते से तो शब्द गायब हो रहे थे……पत्ते के गायब हो रहे शब्दों के साथ मेरे मन की कौतूहलता बढ़ रही थी, कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा था……. मेरी उस दशा को देख वह कन्या ठहाका मारकर हंसने लगी और बोली…..अरे मैं उतनी ही वास्तविक हूँ जितना कि पत्ते पर लिखा हुआ एक-एक शब्द ! मैं अवाक कभी पत्ते को तो कभी कन्या को देख रहा था…….मुझे अपने अतीत की वो सारी घटनाएं याद रही थी जिनका संबंध इस चमत्कारिक घटना से था………मुझे स्मरण हो आया कि मैं तो स्वर्गलोक की अप्सरा रम्भा का पुत्र हूँ और मृत्युलोक में मैं तो एक शाप के कारण अवतरित हुआ हूँ……बात उस समय की है जब स्वर्ग पर अधिकार करने के लिए देवासुर संग्राम चल रहा था……असुरों का पलडा भारी था और देवता हार रहे थे……उस संग्राम में मैं भी हिस्सा लेना चाहता था, मगर छोटे होने के कारण मुझे वहाँ जाने से रोका जा रहा था……… परंतु मैं उस समर में जौहर दिखाने को आकुल था और मैंने एक युक्ति ढूंढ निकाली…….मैंने अपनी मायावी शक्तियों से अपनी काया को बलशाली बना लिया……. किंतु प्रकृति के प्रतिकूल होने के कारण मेरे इस कार्य से ब्रह्माजी कुपित हो उठे और मुझे अगले जन्म में मृत्युलोक में जन्म लेने का अभिशाप दे दिया……शाप के प्रकोप से बचने के लिए मैं भागा और भागते-भागते एक नदी के पास पहुँचा जहाँ कुछ गंधर्व कन्याएं जलक्रीडा कर रही थी…… उन कन्याओं में गन्धर्वलोक की राजकुमारी चित्रलेखा भी थी …….मैं वहाँ से आगे बढ़ सका और चित्रलेखा को अपलक निहारता रहा……… गंधर्व कन्याएं जलक्रीडा छोड़कर मेरे समीप गयी और मुझे घेर ली, डर से मेरा हाल बुरा हो रहा था……. मगर तभी चित्रलेखा मेरे समीप आयी और मुझे propoge कर दी……..मैं असमंजस में पड़ गया और उसे ब्रह्माजी के शाप के बारे में विस्तार से बताया…….सब कुछ सुनकर उसने मुझसे एक वादा किया था और उसी वादे को पूरा कने के लिए आज मेरे कमरे के समीप प्रकट हुई थी…….अब मुझे सबकुछ याद गया था और मैं उस गंधर्वकुमारी को स्पर्श करने जा रहा था……… तभी मेरा room-mate कमरे में study-room से वापस गया और मुझे आँखें खोल सोया देख जोर-जोर से झकझोड़ दिया और मेरे सपनों का शीशमहल पलभर में ही चकनाचूर हो चुका था…. मुझे याद गया था कि कल end-sem है और मेरा पूरा syllabus बाक़ी है………. और एक बार फिर End-sem के एक दिन पहले मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था । ।

मै छोड चुका
तो छोड चुका

प्रिये प्रेम के इस पथ पर
हमको चलना था साथ मगर
हो साथ तेरा हो साथ मेरा
ये राहे साथ नही देती

तन्हा राहो से दर्द भरा
संबंध निभाने से अच्छा

मै तोड चुका
तो तोड चुका

जैसे-जैसे सांसे घटती
ये राहे बंटती जाती है
नाकाम मेरी नज़रे होती
दूरी यूं बढती जाती है

अब किसे याद कि
कभी तुम्हारा
हाथ भी थामा था हमने

वादो के शव पर आस बहा
मुंह मोड चुका
तो मोड चुका

इस दिव्य प्रभात की बेला में
एक नया सा सूरज आया है,
जगमग किरणों के पथ से
एक नया सवेरा लाया है !!

इस प्रभात के स्वागत में
तू अपनी बाहे फैला दे,
आत्मसात कर इन किरणों को
तू अपना तन मन पिघला दे !!

अभेद्य दुर्ग के सीने पर
अपना परचम लहरा दे ,
उस परचम के पहलू में
जो सात स्वरों का साया है ,

जगमग किरणों के पथ से
एक नया सवेरा लाया है …

घना बहुत था अँधेरा,
जिसमे तू अब तक जिया है,
हर पथ पर एक विषधर था,
तूने सबका वीष पिया है ,

चलने को हो जा दृढप्रतिज्ञ ,
हर राह तुझे अपनाएगी,
भर ले अपने मन का दीपक,
ये दिव्य सुबह तब आयेगी,

तन्मय होकर गा ले फिर से,
राग जो मन मैं आया है,
जगमग किरणों के पथ से ,
एक नया सवेरा लाया है !!

नागपंचमी का दिन था ,नाग-पूजा की तैयारी जोरों से चल रही थी । मैं अपने दोस्तो के साथ बैठा हुआ था, हमलोग एक यज्ञ करने वाले थे । तभी विचार उठा की क्यों नही नाग देवता को ही ढूँढकर लाया जाये ,साक्षात नाग-देवता विद्यमान रहेंगे तो पूजा-आरती का अपना ही महत्व होगा । सबकी हाँ में हाँ मिल गयी और सबने सहमति जता दी । अब समस्या थी कि नाग-देव को ढूँढें कहाँ ? फिर भी हमलोग बगीचे की ओर चल पड़े और शायद किस्मत भी अच्छी थी ,एक काला सा नाग कुंडली मारे हुए एक पेड के नीचे बैठा था । अब भगवान के इतने जल्दी दर्शन हो जायेंगे हमलोगों ने कल्पना भी नही की थी । सोचा कि दंडवत हो लूं ,मगर और लोगों को खडे देखा तो इरादा मन में ही रख लिया । अब बारी थी कि कौन नाग-देवता के पास जाकर आग्रह करे कि आज वे अपना गुस्सा त्यागकर हमारा आतिथ्य स्वीकार करें । एक दोस्त ने हिम्मत बटोरा ये सोचकर कि आज तो नाग पूजा है ,नागजी कुछ नही कहेंगे । पर पत्तों की सरसराहट ने नाग-देव की तन्द्रा भंग कर दी ,और उनका फन लहलहाने लगा ,जीभ लपलपाने लगा और वह फूंफकार उठा ,मेरे दोस्त ने वापस हमारी ओर दौड़ लगा दी पर गिर पड़ा । नाग-देव नागपंचमी से बेखबर फूंफकारते हुए बढ़ रहे थे । शायद अब सेकेंडों में दोस्त का काम तमाम करने ही वाला था और हमलोग बेबस दूर से डरे हुए देख रहे थे । तभी अचानक एक नेवला आ गया ,और नाग-देव पर बुरी तरह से टूट पड़ा । हमलोग हक्के-बक्के देख रहे थे कि कैसे उसके शौर्य और पराक्रम के आगे नाग-देव की एक नही चली और नाग-देव टुकड़े -टुकड़े हो गए । नेवला जीत के बाद विजय-जश्न मनाने की जगह वहीं सुस्ताने लगा था .
सारे मित्र हतप्रभ थे और उदास भी, कि अब पूजा कैसे होगी ? मगर एक दोस्त ने सुझाव दिया कि क्यों ना इसी नेवला की धूमधाम से पूजा की जाये ,आख़िर इसने अपनी जान बचायी है । और तर्क भी दिया गया कि शक्तिशाली की हमेशा पूजा की जाती है और बचानेवाला ही देवता माना जाता है । फिर क्या था इरादा झटपट बदल दिया गया और हमलोग नेवला को पकड़ने लगे ,वह इतना थका था कि भाग भी नही पाया मगर हमने समझा कि उन्हें हमारा आमंत्रण स्वीकार है । यज्ञ मंडप को सजाया गया ,अग्नि कुण्ड को सुलगाया गया और नेवला को सजाकर वहाँ बैठाया गया । जय नेवला ,जय नेवला ,जय नेवला देवा … नाग को ये मार दे संत प्रभुदेवा … उच्चारण से वातावरण गूंजने लगा । हमलोगों को बहुत मजा आ रहा था और फैसला करने लगा था मन ही मन कि अब हर साल नेवला-पंचमी ही मनाएंगे । पर उधर नेवला महाराज को पता नही ये सब रास आ रहा था या नही ,वो तो आग की गरमी से तपा जा रहा था और उपर से चारों ओर से लोग घेरे हुये थे । डर के मारे उसकी सिट्टी -पिट्टी गुम थी ,फिर भी इज्जत का अहसास किसे नही हो जाता है । नेवला को भी भनक मिल चुका था कि उसकी इज्जत की जा रही है,शायद ये आदमी लोग इतने भी बुरे नही होते हैं जितना उसने सोच रखा था । पर उसे तपाकर आदमी लोगों को क्या मिलने वाला है और ये लोग कितने असभ्य तरीके से शोर मचा रहे हैं । सच पूछिए तो नेवला को कुछ भी रास नही आ रहा था ,अगर कुछ उसे उम्मीद थी तो बस लड्डू की उस थाली से ,जिसकी सुगंध शुरू से ही उसके जीभ में लालच पैदा कर रही थी। पर हाय रे किस्मत ,पूजा भी खत्म हुआ ,आरती भी खत्म हुई और लोग लड्डू की थाली उठा लिए । अब लड्डू की थाल पर हमारे दोस्त झपट रहे थे ,बस नेवला देव से यही बर्दास्त नही हो पाया और उछल-कूद मचाने लगे। बस फिर क्या था किसी के पाँव की ठोकर लग गयी और वो गरम कुण्ड में जा गिरे । उसके बाद अपने झुलसे जिस्म को लेकर वह कहाँ चले गए ,हमलोगों ने आशीर्वाद लेने के लिए उन्हें बहुत ढूँढा मगर वह साल भर तक दिखायी नही दिए । बीच-बीच में नागजी दिखते रहे मगर नेवला के दर्शन दुर्लभ हो चुके थे । आखिरकार नाग-देव को भी मनाना था,इसलिये नाग-पूजा ही फिर शुरू करना पड़ा ,और अब भी हमलोग नाग-पंचमी ही मनाते हैं । ।

-आलोक कुमार-

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!

बंधुओं,
यह सर्वविदित हैं की बीते दिन मानवता को शर्मसार करने वाले कुकृत्य पुनः दुहराए गए….दिल्ली की गलियों में फिर किलकारियां गूंजी ,फिर कोई अनाथ हुआ ,फिर कोई दिल सुन्न हुआ होगा ..तो क्या यह सिलसिला चलता ही रहेगा …नहीं ये थमेगा और इसे रोकेंगे हम सब…बस एक ज्वाला की दरकार हैं …उसी ज्वाला की एक इकाई स्वरुप प्रस्तुत मेरी ये रचना…..

ओ प्रफुल्लित मनुवंशजों !!

निद्रा की गोद में
सुसुप्त जीवन तुम्हारा
क्यों नहीं बेधती
अपनों की ही करुण वेदना
तुम चेतनाहीन तो नहीं
फिर क्यों नहीं थमती
विचारों की तकरार

झंकृत करती मानवता
की सुशोभित दर्प को
वो मासूम पल
क्यों होते बदनाम

विनाश की फर्श पर
मुरझाता जीवन
जागो मेरे बांकुरों
कर दो पल समर्पित
दूसरों के खातिर

शुभ्रमयी दिवसों की चाह में
परम की जन्नत को
उतार ला ज़मीं पर
कह सके खुदा भी
बन्दे तू ही मानव हैं
विसरित जिसकी नभ में
कालजयी अखंड गाथा

एक शामियाना
निर्मित ऐसा कर
देवराज भी आ ठहरे
कुछ ऐसा कर
ओ मानवता के मीत
– भास्कर भारती

ग़ज़ल

अपने बीमार को ये कैसी सजा देते हैं ?
वो जब भी आते हैं, दर्द और बढा देते हैं !!

सुना है उसने छुपा रक्खी है बड़ी हुश्न की दौलत,
फ़कीर आये उनके दर पे, देखे तोः क्या देते हैं !!

बचेगा कैसे भला कोई उनकी निगाह-ए-नश्तर से,
संभलने भी  नहीं देते और तीर चला देते हैं !!

दर्द-आशनाई का क्या खूब ये मंजर देखा,
खुद जख्म लगाते हैं, औ खुद ही हवा देते हैं !!

दुनिया में कभी हमने ना जीने का सलीका सीखा,
फरेब खा-खा के हम उनको वफ़ा देते हैं !!

ए खुदा तू मेरे कातिल को सलामत रखना,
उठा के कब्र से हम जो हाथ दुआ देते हैं !!

ओ रे नीरे !
आज मचल जा कि
अब अंतस में तेरे
भाव की लहरें उठेंगी
स्वप्न के संचार होंगे

और इस नीरस धरा पर
पुष्प हर रंग का खिलेगा

ना थी मूरत
था सनाटा
आज बज जाए मंजीरे
ओ रे नीरे !

स्वप्न की दुनिया का
सच में
आज मन
संचार होगा

आज सोयेगा अँधेरा
प्रेम का उजियार होगा

आज सूखे जलधरो से
भी यहाँ पानी गिरेगा

झूम तू खुशियों में लेकिन
थोडा धीरे
ओ रे नीरे !

पतझरो में झर गया
हर पात वृक्षों से मगर
अब वास आया है वसन्तो का
अभी न शोक कर

कि अब हवाए
शीत की लहरों को अपने संग लिए
फैला रही है दूर तक सुरभि

बदन में
उठ रहे कम्पन है
जैसे ही छुआ इस
वात ने है

एक उत्सव जग में है
और एक मेरे मन में है
एक उत्सव कर रही है
पवन ये
मुझको घेरे
ओ रे नीरे !

मन ही केवल खुश नहीं है
देखो-देखो इन विहग के कलरवो को
आज ये आकाश सारा
नाप देंगे

देखो पातो की विवशता
बन्धनों में बंद है
पर आज फिर भी
चेष्टा उड़ने की है
सो मचलते है
संग हवाओं के |

लुभाते मन को मेरे
ओ रे नीरे !!

संत जेवियर मुंबई के सालाना जलसे मल्हार की हिंदी प्रतियोगिता में आई.आई.टी. की टीम प्रथम आयी. याद के तौर पर मैं उसे वाणी पर डाल रहा हूँ. आप पढ़कर ये भी अनुमान लगा सकते हैं कि छात्रों के बीच की प्रतियोगिता का स्तर क्या होता है .

विषय: आगरा, ताजमहल बनाते कर्मचारियों के बीच का वार्तालाप
समय : दो घंटे

यमुना की उन्मत्त लहरें, तट से जा टकराती है
गाती है कल-कल ध्वनि में,चलती है बल खाती है;
नीचे लहरों का खेल अमर,ऊपर चाँद की चमक प्रखर
एक पुरुष पुलकित मन में ,घूम रहा है उस तट पर ;

पुरुष: पूनम की रातों का जगमग नजारा
चकोरी का चंदा को होगा इशारा
कि रोशन तू अबसे अकेला ना होगा
जमीं पर भी चंदा बनाया गया है .
दूसरा पुरुष: (उसकी एकाग्रता भंग करते हुए )
वाह रे! तेरे स्वप्न निराले, अनगिन-अनगिन रंगों वाले
काश कभी ऐसा हो पाए , चंदा कहीं धरा आ जाए .
हैं मजदूर, हाथ फावडा, काम है अपना महल बनाना
सपने मुगलों को दे दो तुम, उनका काम है स्वप्न सजाना.

पहला मजदूर :
क्यूँ ना मैं ये सपने देखूं ,मेरी मेहनत, मेरा पसीना
जब-जब तोडूं संगमरमर ये, चौडा होता मेरा सीना.
दूसरा मजदूर :
पेट कहाँ भरता सपनों से, सपने नहीं खिलाते रोटी
यहाँ जलानी होती भट्टी, भूख है मिटती तब बच्चों की;
प्रेम की बात कहाँ करते हो,प्रेम कहाँ टिकता भूखों में
रात-दिन हम करते श्रम हैं, तब घर में चूल्हे जलते हैं ..
पहला मजदूर :( सोचते हुए )
सही कहा है तुमने भाई, देखी हमने खूब खुदाई
सपने शोभे राजमहल को, हमने तो बस कुटिया पाई.
दूसरा मजदूर: (उसका समर्थन करते हुए )
राजमहल में है संगमरमर और अपने मिट्टी के घर ..
पहला मजदूर:(भावुक होते हुए )
प्रेम यहाँ हीरों तुलता है ,प्रेम का भी यहाँ मोल है
मैं ताज नहीं बनवा सकता पर प्रेम मेरा अनमोल है ;
ताज बिखर जायेगा एक दिन ,प्रेम नहीं रह जायेगा
मुझ गरीब का प्रेम अमर है, कभी ना तोला जायेगा.
दूसरा मजदूर :( भावुक हो जाता है )
ताज अगर गिर जाए एक दिन , यादें सब मिट जायेंगी
अमिट छाप मेरे हाथों की , पत्थर पर रह जायेगी ;
हाथ ही मेरा जगन्नाथ है, करता है जग का निर्माण
मेरे हाथों की शक्ति का ,ये ताजमहल होगा प्रमाण ..

नेपथ्य से :
” सोचा था किसने इन करों को शासक यूँ कटवा देगा ,
ताजमहल की सुन्दरता में, शामिल है कई चीखें भी “

कल हमने एक रचनात्मक लेखन प्रतियोगिता रखी थी, जिसमें एक अनपढ़ नेता रामप्रसाद जी को परमाणु करार के बारे में बताना था और उनसे विश्वास मत हासिल करना था ,प्रथम वर्ष के छात्र ध्रुव सोनी का लेख कुछ इस तरह का है . परमाणु संधि का मतलब ये है कि…

सोनिया गांधी ,अपनी पूरी नेता मंडली के साथ रामप्रसादजी के गाँव रामपुर पहुँच गयी . लेकिन ये क्या नेताजी तो अबतक कृषक बने हुए हैं . सोनिया ने पूरी स्थिति को समझते हुए परमाणु मुद्दे को नया ही रूप दे दिया .
सोनिया जी ने अपना प्रपत्र रामप्रसादजी को दिया और कहा कि अपनी पी.ऐ. से कहो इसे आपको समझा दे .
रामप्रसादजी : अरे लाजो ! ओ मारी भागवान !जरा भन्जे तो आ, मेम्जी कोई पत्र लिखी है म्हारे वास्ते .
श्रीमतीजी गुस्से से आग बबूला हो पढने लगी – “सीरी मन रामप्रशाद जी तुम इश देस का हालत देख के अब परमाणु संधि स्वीकोर कोर लो .”
रामप्रसादजी – ओय ये मेम्जी की हिन्दी म्हारे समझ नही आवे .
अब सोनियाजी ने राजनीति दाँव खेलते हुए एक हिन्दू कंग्रेशी नेता को कहा कि वे रामप्रसादजी को तैयार करेंगे तो उन्हें मंत्री बना देंगे. लालच देखकर हिन्दू नेता तैयार हो गया और शुरू हो गया . -” अरे रामप्रसादजी , आपको मालूम है आपका यह खेत सोने उगलने वाला है और यह छप्पर जिससे बारिश में पानी टपकता है, अब इससे हीरे-मोती बरसेंगे .”
रामप्रसादजी : “अरे तुने भांग खा ली क्या ?”
नेता :”ये सबकुछ हो जायेगा, अगर आपने परमाणु संधि पर अपना मत दे दिया .”
रामप्रसादजी : अरे ये परमाणु संधि की है ?
नेता-” परमाणु संधि का मतलब है – आम के आम, गुठलियों के दाम .”
‘परमाणु संधि में तुम्हारे गाँव के किसानों को मुफ्त में बीज, खाद, ट्रेक्टर भी बांटे जायेंगे और ये सब अमरीका से आयेंगे . अरे तुम्हारा मुन्ना अब विदेशी अनाज खाने वाला है , रामप्रसादजी बस एक बार हाँ कर दो .
परमाणु संधि के बाद तुम्हारे घर का सारा काम लाजो को नही करना पड़ेगा . काम तो नौकर करेंगे !और तुम लाजोजी के साथ अमरीका में शादी की दसवीं वर्षगाँठ मनाना .
परमाणु संधि के बाद तेरे बच्चे को अंगरेजी स्कूल में पढाया जायेगा .परमाणु संधि का मतलब है ,हर गाँव में अंगरेजी स्कूल और वो भी संस्कृत के साथ . गाँव के बड़े बूढों को भजन और गीता-पाठ पढाया जायेगा.’
‘और अगर तुमने संधि पर हाँ कर दी तो तेरी तो पाँचों उंगलियाँ घी में .’
रामप्रसादजी – वो कैसे?
नेताजी – ‘अरे भाई ,तुझे तो पता है कि तेरी पिछली पत्नी गुणवती की बेटी २५ साल की हो गयी है और अबतक कुंवारी है. तुझे अभी सबसे ज्यादा चिंता उसी की है न . तो सुन सोनिया जी का बेटा राहुल अब ३८ बर्ष का हो गया है और अबतक कुंवारा है . परमाणु संधि का मतलब है कि सोनियाजी अपने बेटे की शादी तेरी बेटी से कर देगी . दहेज़ भी नही लेगी . बस हाँ कर दे.’
-और ये सुनते ही रामप्रसादजी फूले नही समाये ,और तुंरत अपनी सहमति दे दी .

रातो को मैं सपने तेरे
बुनता हूँ
मन ही मन मैं यादे तेरी गुनता हूँ
रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ …….

तेरी यादे तेरी बातें
मन के अपने प्यारे नाते
हर साँस मे तेरा नाम बसा
मैं ख़ुद की धड़कन सुनता हूँ

रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ…..

बैठ मैं तारे गिनता रहता
ख़ुद ही हस्त ख़ुद से कहता
दर्द भरे इस जीवन से
अब मैं खुशिया चुनता हूँ

रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ……

चाँद भी अब हस्ता है मुझपे
पागल मुझको कहता है
क्या खैर चकोर दीवाने की
जो उसकी धुन मे रहता है

रैना मैं दीवानों जैसे
प्यार मे सर को धुनता हूँ….
रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ……

क्या ख़बर शमा को आशिक की
क्या ख़बर उसे दीवाने की
क्या लेना उसको ख़ाक हुई
हस्ती से एक परवाने की

मैं हस्ती अप्नी ख़ाक किए
तेरे प्रेम के कांटे चुनता हूँ

रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ………

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