हिन्दी लेखन कार्यशाला
Posted in कार्यशाला, तस्वीरें on October 31, 2007 | 6 Comments »
कविता पढ़ता प्रथमवर्षीय छात्र
कम्पयुटर पर देवनागरी का प्रयोग (विकास)
अतिथि का परिचय देती अपर्णा
लेखिका सुधा अरोड़ा
तैयारी : कुछ और करने की
Posted in कार्यशाला, तस्वीरें on October 31, 2007 | 6 Comments »
कविता पढ़ता प्रथमवर्षीय छात्र
कम्पयुटर पर देवनागरी का प्रयोग (विकास)
अतिथि का परिचय देती अपर्णा
लेखिका सुधा अरोड़ा
तैयारी : कुछ और करने की
Posted in आशीष पालीवाल, कविता on October 12, 2007 | 4 Comments »
धूप में किसी पेड की
छाया को कहते मित्रता,
ईश के हाथो बनी
काया को कहते मित्रता ||
ग़र निराशा आ भी जाए
मित्रता अवलम्ब है
बोझ ले विश्वास पर
यह वह अटल स्तम्भ है ||
स्वार्थ को जाने नही
वह भावना है मित्रता
मित्र के हर स्वप्न की
एक कामना है मित्रता ||
मरीचिका में सत्य का
दर्पन दिखा दे मित्रता
निश्वास में निर्वात में
कम्पन [...]
Posted in कविता, मुदित जैन on October 8, 2007 | 3 Comments »
परछाईयों के इस शहर में
ढूँढता हूँ अपनी परछाई
न कोई दीप प्रज्जवलित
मेरे आगे, मेरे पीछे
मेरे दांये या कि बायें
खेल जगत का,संगीत सत्य का
नाट्य-नृत्य का,साहित्य शब्द का.
परछाईयों के इस नगर में
खोजता मैं खुद की परछाई
मन में उठती रहती है
बार-बार एक चिंगारी
पर दिये की लौ अभी तक
उसको जला नही पायी
क्या दिये में तेल [...]
Posted in आलोक कुमार, कविता on October 4, 2007 | 1 Comment »
बचपन में अपने गाँव में
आम की पेड़ों की छाँव में
मैं मिटटी पर लोटना चाहता था
गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था
तो माँ ने मना किया
कि तुम तो अच्छे बच्चे हो
बिगड़ जाओगे
और मैं मान गया ,
कुछ बड़ा होकर स्कूल में
मस्ती की भूल में
भागकर सिनेमा देखना चाहता था
गाली-गलौज करना [...]
Posted in कविता, नीरज शारदा on October 4, 2007 | 4 Comments »
सागर की अपनी विशिष्टता है
वह अनंत है, अगाध है, अथाह है
जिसमें होता असीम उर्जा का अविरत प्रवाह है .
लेकिन मैं उस नन्ही छोटी लहर को
जीवन के अधिक समीप पाता हूँ ,
वह नन्ही लहर ,जो दूर किसी छोर से जन्म पाती है
और उसी पल से नन्हें संघर्ष की कथा शुरू हो जाती है
संघर्ष यही है ‘अस्तित्व [...]
Posted in कविता, भास्कर भारती on October 4, 2007 | 3 Comments »
मान गया भगवन तेरी अदा बड़ी निराली
कहॉ था तू जब छोड़ रहा था मैं जग हरियाली
किस जुबान से कहूँ अपनी बिखरी ये दास्तान
बालू की रेत में मिला मेरा सपना आलीशान
पल-पल देता रहा इम्तिहान
कितनों की करूं मैं बखान
ये जीवन प्रतीत हुआ चलचित्र समान
दुःख ही तो था मेरा मित्र महान
सुना था जिंदगी की डगर
बरी [...]
Posted in कविता, मनीष सौरभ on October 4, 2007 | 1 Comment »
जिंदगी की राह-ए-गुजर में यार मेरा था पुराना
आईने ने भी कर दिया मुझसे अब तो ये बहाना
दिल दिया है जिसको उसे ये दर्द भी दे आइये
दौर-ए-जहाँ के ज़ख्म अब मुझको नहीं दिखलाइये
लाख कोशिश कर चुका, आईने को मैं भाता नहीं
बेरहम मेरा सनम है, आईना समझ पाता नहीं
आज जब रुखसत हुए हैं तो इतना तो कर [...]
Posted in कविता, हर्षवर्धन on October 4, 2007 | 7 Comments »
अमराई की छाँव सी
सपनों के गाँव सा ,
जैसे हो सीप में मोती
समंदर में नाव सा ,
कोई गीत गाना चाहता हूँ
तुमको सुनाना चाहता हूँ ,
[...]
Posted in कविता, गरिमा तिवारी on October 2, 2007 | 4 Comments »
इस दिल की भावना कोई ना समझ पाया
कि आते आते ये दर्द आँखों में भर आया
इस दर्द को पोंछने में भी एक टीसें सी उठी
बह जाने दो मुझे एक बार कहीं ये आवाज उठी
आज फिर उसे रोकने में हाथ कंपकंपाया है
इस दर्दनाक आवाज को फिर दिल की गहराईयों में दबाया है
कभी पुकारे वो आवाज दुबारा
गूँजेगा [...]
Posted in कविता, विकास कुमार on October 2, 2007 | 5 Comments »
ठंड हो गयी है.
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया.
गर्म कमरे से बाहर निकलते ही
तुम्हारी यादें नश्तर की तरह
हड्डियों में समाने लगती हैं.
थोड़ा असर शायद हवाओं में भी होगा.
लेकिन यह मौसम वैसा नहीं है
मेरी ठंडी उंगलियाँ -
तुम्हारे होठों की गरमी के बिना
सूज गयी हैं.
देखो ना!
अब कवितायें कहाँ लिख पाता हूँ?
लिखने की कोशिश करते ही,
उँगलियों की [...]