नही मैं सरगम संध्या की
ना ही िनशा का साया हूँ ,
मैं एक सवेरा इस युग का
धरती की धुन्धिल काया पर
किरणे मधुर फैलाता हूँ ;
नहीं पिटारी जादू की
ना ही कोई माया हूँ ,
मैं एक सपेरा इस युग का
सर्पों का भी मन बहलाने
चंचल बीन बजाता हूँ ;
नहीं मैं कोई कल्पना कोरी
ना ही किसी का छाया हूँ ,
मैं एक चितेरा इस युग का
पकड़ तुलिका इन हाथों में
रंगों को बिखराता हूँ ;
नहीं फरिस्ता इस दुनिया का
ना ही कुछ कहने आया हूँ ,
मैं एक लुटेरा इस युग का
लूट तुम्हारे भावों को
कविता नया बनाता हूँ ।
– आलोक कुमार
आलोक जी,
आपने अपने अंदर के कवि को अच्छी परिभाषा दी है.
लुटेरा इस युग का
बहुत सही!!
बहुत बढ़िया बंधु!!
आलोक यहां पर देखें मैंने आपके ब्लाग पर कुछ लिखा है
http://subeerin.blogspot.com/2007/10/blog-post_05.html
aj ke yug ke savere ko mera NAMSKASR