लहू तो आज भी निकला है
लहू तो तब भी निकला था
जब तेरी एक झलक को,
तेरे दर पे माथा पीटा था
…पर सिर से
लहू तो तब भी निकला था
जब तुझे पाने को
आँखों से नींद उडायी थी
दर-बदर की ठोकरें खायी थी
…पर पांव से
लहू तो तब भी निकला था
आशिकों की फौज से तेरे
छिडी जब लड़ाई थी
जमके हुई हाथापाई थी
..पर हाथों से
लहू तो आज भी निकला है
इश्क की दौलत से मुझको
जब तुमने बेजार किया है
वफ़ा के जवाब में
बेवफाई का इजहार किया है
….पर आँखों से
:- आश्विन श्रीवास्तव
द्वितीय वर्ष
छात्रावास -13
लहू कई जगहों से निकल सकते हैं … भावनाएं कुछ भी कर सकती है !!