मान गया भगवन तेरी अदा बड़ी निराली
कहॉ था तू जब छोड़ रहा था मैं जग हरियाली
किस जुबान से कहूँ अपनी बिखरी ये दास्तान
बालू की रेत में मिला मेरा सपना आलीशान
पल-पल देता रहा इम्तिहान
कितनों की करूं मैं बखान
ये जीवन प्रतीत हुआ चलचित्र समान
दुःख ही तो था मेरा मित्र महान
सुना था जिंदगी की डगर
बरी जटिल होती हैं जिसकी सफ़र
भ्रम का ही होता हैं आवरण
जिससे पाना होता हैं निवारण
मैं ठहरा मासूम नादान
सारी बुराइयों से अनजान
जग की चपलताओं का था नहीं ज्ञान
गाता था बस एक ही गान
फूलों की महक बन जाऊँगा
अंधेरों में दीप जलाऊंगा
भूलना चाहो भी तो भूल ना पाओ
दिल में कुछ तान ऐसे सजा दूंगा
तेरे गुलशन में कुछ फूल ऐसे खिलाऊँगा
जो मुरझाना नहीं जानेंगे
वक़्त के साथ हम हो या ना हो
आप कामयाबी की पंक्तियाँ लिख जायेंगे
पर देख दुनिया की रंजिशें
जग में फैली बंदिशें
दबी ही रह गयी सारी ख्वाहिशें
करनी थी जिसकी नुमाइशें
मेरा ही अस्तित्व था दांव पर
मानो कुल्हारी परी हो पांव पर
हो गया मैं जैसे अपंग
कंचन जग हुई बदरंग
मेरा संघर्षरत जीवन
पाया क्या इसने
अटूट ग़मों का सिलसिला
जिसे हार के बाद हार ही मिला
थमी जीवन
रुकी स्पंदन
अब क्या !
जीवन या मरण !
और कहना ही पड़ा
अलविदा
ए फिजां ए चमन
तुझे अलविदा
…तुझे अलविदा
– भास्कर भारती
बहुत अच्छा लगा। आप प्रयास जारी रखिये
बेहतरीन, विकास.
वाणी संस्था IIT के छात्रों का एक अति सराहनीय प्रयास है और इसे चिट्ठाजगत से जोड़ कर एक उत्तम कार्य किया है.
उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में आप अन्य शहरों के IIT को भी इससे जोड़ने का प्रयास करेंगे. साहित्यिक स्तर पर आपसी मेलजोल का एक आदर्श एवं सुगठित मंच हो सकता है यह.
इस उम्दा कार्य के लिये आप और आपके समस्त मित्र, जो इस संस्था से जुड़े है, साधुवाद के पात्र हैं.
उज्जवल भविष्य के लिये अनेकों शुभकामनायें.
एक बार पुनः बधाई स्वीकारें.
भास्कर भारती को इस कविता के लिये बधाई. सुन्दर भाव लिये यह कविता पसंद आई. आप नियमित लिखें. पाठको की कभी कमी नहीं आयेगी, ऐसा मेरा विश्वास है. अनेकों शुभकामनायें.