अमराई की छाँव सी
सपनों के गाँव सा ,
जैसे हो सीप में मोती
समंदर में नाव सा ,
कोई गीत गाना चाहता हूँ
तुमको सुनाना चाहता हूँ ,
खुशबु हो जिसमें फैली
सोंधी सी माटी की
छाँव हो जिसपर पसरी
अरहर की टाटी सी ,
ऐसे उपवन के जैसा
गीत गाना चाहता हूँ ,
निर्झर के नाद सा
वन के संवाद सा
खामोशी जिसमें गूंजे
ऐसे आह्लाद का
कोई गीत गाना चाहता हूँ
तुमको सुनाना चाहता हूँ ,
नदिया के तट पर खड़े
बूढ़े से पेड़ का
बच्चो की सी सरलता
हँसते अधेर का ,
कोई गीत गाना चाहता हूँ
तुमको सुनाना चाहता हूँ ,
वो मीठी धुप देखो
पत्तों से छानकर
ज्यों रेशमी ताना बाना
बुनता है कोई बुनकर ,
ऐसा ही बुना हुआ
कोई गीत गाना चाहता हूँ
तुमको सुनाना चाहता हूँ .
– हर्षवर्धन
प्रथम वर्ष
छात्रावास-2
अच्छी कविता है.
सुनाईये, हम सुनते रहेंगे
उत्तम रचना. बधाई हर्षवर्धन जी को. नियमित लिखें.
सुनाईये, हम सुनते रहेंगे
बहुत खूब.
निर्झर के नाद सा
वन के संवाद सा
खामोशी जिसमें गूंजे
ऐसे आह्लाद का
कोई गीत गाना चाहता हूँ
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बहुत सुन्दर हर्ष …
लगता है आप प्रसिद्ध कवि पंत से बहुत प्रभावित है