बचपन में अपने गाँव में
आम की पेड़ों की छाँव में
मैं मिटटी पर लोटना चाहता था
गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था
तो माँ ने मना किया
कि तुम तो अच्छे बच्चे हो
बिगड़ जाओगे
और मैं मान गया ,
कुछ बड़ा होकर स्कूल में
मस्ती की भूल में
भागकर सिनेमा देखना चाहता था
गाली-गलौज करना चाहता था
तो शिक्षकों ने मना किया
कि तुम तो अच्छे बच्चे हो
बिगड़ जाओगे
और मैं मान गया ,
कालेज का दिन भी आया
मन मेरा भी भरमाया
किसी ने नही समझाया
मगर… मैं तो अच्छा बच्चा हूँ
बिगड़ जाऊंगा …
..और मैं मान गया.
– आलोक कुमार
आलोक जी आप सचमुच अच्छे बच्चे है, इतनी सुन्दर रचना लिखते हैं, सिर्फ़ जर्रा सा बिगड़ जाइए कोई बात नहीं हम फ़िर भी आपको अच्छा बच्चा समझेगें, सर्टिफ़िकेट भी दे देगें, चिन्ता काहे करत हो॥है तुम्हें भी इज़ाज़त, कर ले तू भी थोड़ी मस्ती…:)
kaha man gaye, college me aap kavita likh rahe hai ki nahi?