मेरी परछाई
October 8, 2007 by vikash
परछाईयों के इस शहर में
ढूँढता हूँ अपनी परछाई
न कोई दीप प्रज्जवलित
मेरे आगे, मेरे पीछे
मेरे दांये या कि बायें
खेल जगत का,संगीत सत्य का
नाट्य-नृत्य का,साहित्य शब्द का.
परछाईयों के इस नगर में
खोजता मैं खुद की परछाई
मन में उठती रहती है
बार-बार एक चिंगारी
पर दिये की लौ अभी तक
उसको जला नही पायी
क्या दिये में तेल कम है?
या फिर बाती शुष्क रही है ?
क्यूँ बार-बार उठती चिंगारी
भीतर दीप जला नहीं पाती .
जिस दिये की लौ में
ढूँढता मैं खुद की परछाई
विश्वास पर अटूट है मन में
दीपक अब जलेंगे सारे
मेरे आगे , मेरे पीछे
मेरे दांये और बायें,
खेल जगत के,संगीत सत्य के
नाट्य-नृत्य के,साहित्य शब्द के,
किया प्रथम ‘मुदित’ सृजन है
‘मुदित’ होगी मेरी परछाई
परछाईयों के इस शहर में
बस दिखेंगी मेरी परछाई ..
मुदित जैन
प्रथम वर्ष
छात्रावास-3
ज़रूर दिखेगीं एक दिन आपकी परछाई
Very good
A VERY GOOD POEM SHOWING THE REALITY OF LIFE.