अपने बीमार को ये कैसी सजा देते हैं ?
वो जब भी आते हैं, दर्द और बढा देते हैं !!
सुना है उसने छुपा रक्खी है बड़ी हुश्न की दौलत,
फ़कीर आये उनके दर पे, देखे तोः क्या देते हैं !!
बचेगा कैसे भला कोई उनकी निगाह-ए-नश्तर से,
संभलने भी नहीं देते और तीर चला देते हैं !!
दर्द-आशनाई का क्या खूब ये मंजर देखा,
खुद जख्म लगाते हैं, औ खुद ही हवा देते हैं !!
दुनिया में कभी हमने ना जीने का सलीका सीखा,
फरेब खा-खा के हम उनको वफ़ा देते हैं !!
ए खुदा तू मेरे कातिल को सलामत रखना,
उठा के कब्र से हम जो हाथ दुआ देते हैं !!
बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आप ने…वाह. आप के इस शेर को पढ़ कर:
ए खुदा तू मेरे कातिल को सलामत रखना,
उठा के कब्र से हम जो हाथ दुआ देते हैं !!
मुझे इस से मिलता जुलता एक शेर याद आ गया:
यारब मेरे दुश्मन को सलामत रखना
वरना मेरे मरने की दुआ कौन करेगा
नीरज
Too Good
LAGTA HAI KHUNE JIGAR HAI AAP KI
SURAT NAZAR AATI HAI BE-DARDO-KI
realy its a nice. keep it up. ———————-
baijnath sharma ‘mintu’