इस दिव्य प्रभात की बेला में
एक नया सा सूरज आया है,
जगमग किरणों के पथ से
एक नया सवेरा लाया है !!
इस प्रभात के स्वागत में
तू अपनी बाहे फैला दे,
आत्मसात कर इन किरणों को
तू अपना तन मन पिघला दे !!
अभेद्य दुर्ग के सीने पर
अपना परचम लहरा दे ,
उस परचम के पहलू में
जो सात स्वरों का साया है [...]
Archive for October, 2008
नया सवेरा
Posted in कविता, बिरजू on October 19, 2008 | 1 Comment »