उस हसीना की यादों में पूरी रात जागा था ,और सुबह होते ही झटपट class भागा था ;lecture में बैठे-बैठे, मैं सोने लगा था,अपने आप पर नियंत्रण खोने लगा था ।मगर प्यारे prof ने,ये होने नहीं दियापलभर के लिए भी मुझे सोने नहीं दिया ;lecture से लौटकर बिस्तर पर सो गया,उसके हसीं सपनों में फ़िर [...]
Archive for the ‘आलोक कुमार’ Category
IIT की जिन्दगी
Posted in आलोक कुमार, कविता on सितम्बर 8, 2009 | 7 Comments »
हमलोग नाग-पंचमी क्यों मनाते हैं ?
Posted in आलोक कुमार, कहानी on सितम्बर 23, 2008 | 5 Comments »
नागपंचमी का दिन था ,नाग-पूजा की तैयारी जोरों से चल रही थी । मैं अपने दोस्तो के साथ बैठा हुआ था, हमलोग एक यज्ञ करने वाले थे । तभी विचार उठा की क्यों नही नाग देवता को ही ढूँढकर लाया जाये ,साक्षात नाग-देवता विद्यमान रहेंगे तो पूजा-आरती का अपना ही महत्व होगा । सबकी हाँ [...]
ताजमहल बनाते कर्मचारियों के बीच का वार्तालाप
Posted in आलोक कुमार, आशीष पालीवाल, प्रतियोगिता on अगस्त 16, 2008 | 30 Comments »
संत जेवियर मुंबई के सालाना जलसे मल्हार की हिंदी प्रतियोगिता में आई.आई.टी. की टीम प्रथम आयी. याद के तौर पर मैं उसे वाणी पर डाल रहा हूँ. आप पढ़कर ये भी अनुमान लगा सकते हैं कि छात्रों के बीच की प्रतियोगिता का स्तर क्या होता है . विषय: आगरा, ताजमहल बनाते कर्मचारियों के बीच का [...]
कुछ छूट गया है
Posted in आलोक कुमार, कविता on जुलाई 17, 2008 | 3 Comments »
शायद कुछ छूट गया है; दर्द दिया जो तूने मुझको भूल गया मैं उन सबको पर, दिल से उनका था अपनापन वो अपनापन टूट गया है , शायद कुछ छूट गया है; तेरे गम को भूल गया मैं खंडहरों में महल बनाकर, पर कंकर-पत्थर से पिटकर भोला दिल टूट गया है , शायद कुछ छूट [...]
कुछ िलख रहा हूँ
Posted in आलोक कुमार, कविता on फ़रवरी 10, 2008 | 1 Comment »
ये अंधेरी रात है पर अनिगनत हैं दीये यहाँ इन दीयों की ज्योित में जगमगाता िदख रहा हूँ आज मैं कुछ िलख रहा हूँ , जगमगा लो द्वार-घर तुम और जगत संसार अब तुम एक लपट िदखाने इस जग को जलता हुआ िमट रहा हूँ आज मैं कुछ िलख रहा हूँ , अनिगनत इस पथ [...]
मैं मान गया
Posted in आलोक कुमार, कविता on अक्टूबर 4, 2007 | 2 Comments »
बचपन में अपने गाँव में आम की पेड़ों की छाँव में मैं मिटटी पर लोटना चाहता था गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था तो माँ ने मना किया कि तुम तो अच्छे बच्चे हो बिगड़ जाओगे और मैं मान गया , कुछ बड़ा होकर स्कूल में मस्ती की भूल में भागकर सिनेमा देखना चाहता था गाली-गलौज करना [...]
मैं
Posted in आलोक कुमार, कविता on अक्टूबर 2, 2007 | 4 Comments »
नही मैं सरगम संध्या की ना ही िनशा का साया हूँ , मैं एक सवेरा इस युग का धरती की धुन्धिल काया पर किरणे मधुर फैलाता हूँ ; नहीं पिटारी जादू की ना ही कोई माया हूँ , मैं एक सपेरा इस युग का सर्पों का भी मन बहलाने चंचल बीन बजाता हूँ ; नहीं [...]