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Archive for the ‘आलोक कुमार’ Category

ये अंधेरी रात है पर
अनिगनत हैं दीये यहाँ
इन दीयों की ज्योित में
जगमगाता िदख रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ ,
जगमगा लो द्वार-घर तुम
और जगत संसार अब तुम
एक लपट िदखाने इस जग को
जलता हुआ िमट रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ ,
अनिगनत इस पथ गए
पर वो निशानें अब कहाँ
उन निशानों को ढूँढता
पत्थरों से िपट [...]

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बचपन में अपने गाँव में
आम की पेड़ों की छाँव में
मैं मिटटी पर लोटना चाहता था
गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था
तो माँ ने मना किया
कि तुम तो अच्छे बच्चे हो
बिगड़ जाओगे
और मैं मान गया ,
कुछ बड़ा होकर स्कूल में
मस्ती की भूल में
भागकर सिनेमा देखना चाहता था
गाली-गलौज करना [...]

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नही मैं सरगम संध्या की
ना ही िनशा का साया हूँ ,
मैं एक सवेरा इस युग का
धरती की धुन्धिल काया पर
किरणे मधुर फैलाता हूँ ;
नहीं पिटारी जादू की
ना ही कोई माया हूँ ,
मैं एक सपेरा इस युग का
सर्पों का भी मन बहलाने
चंचल बीन बजाता हूँ ;
नहीं मैं कोई कल्पना कोरी
ना ही किसी का छाया [...]

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