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Archive for the ‘ऋषभ जैन’ Category

अनंत

क्या है सघन मेघों के उस पार, नही जानता । हो सकता है अंधकार , या हो सकते हैं सूर्य हजार, यही मानता । सत्य छुपा हो उस चोटी पर, जो हो मेघों से भी ऊपर । बादल से छनती किरण थाम लूँ , उस चोटी को लक्ष्य मान लूँ । विकट सरल बाधाएं चीर [...]

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उसमें अनंत गहराई है, है व्याकुलता, तन्हाई है, ढूंढ सको तो ढूंढ लो , एक ‘सोता‘उसमें कहीं बहता है- कवि तो ख़ुद एक कविता है । दुनिया से बेगाना है, दुनियादारी से अनजाना है, अव्यक्त, उलझे भावों को, वो कागज़ पर लिख देता है- कवि तो ख़ुद एक कविता है । शब्दों की भी सीमायें [...]

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