Feed on
Posts
Comments

Archive for the ‘कविता’ Category

हो जाऊँ कभी मैं तेज (बिजली) सा
सूरज की तेज किरण सा
घुमु मैं कहीं भी
हो घर मेरा मधुवन सा
राज करू जहां पर मैं
कहलाऊँ मैं भगवन सा
जो चाहू वो मिल जाए
वो … जाए वो जी जाए
झूमु कभी मैं सावन सा
कभी सोचता हूँ दोडू भागु
कस्तूरी के लिए जैसे
वन में कोई हिरन सा
कभी कहीं खो जाऊँ मैं
आसमा के तारो [...]

Read Full Post »

व्यर्थ जगत,
व्यर्थ जीवन ,
व्यर्थ मेरी आत्मा |
व्यर्थ है सब िमथ्या,
व्यर्थ है सब सत्य |
व्यर्थ है ये नभ,
व्यर्थ ही आिदत्य ||
व्यर्थ सारा ज्ञान है ,
व्यर्थ ही अिभमान है |||
व्यर्थ थी ये मोह-माया ,
व्यर्थता अब भी िवध्य्मान है ||||
व्यर्थ जगत ,
व्यर्थ जीवन,
व्यर्थ मेरी आत्मा |
व्यर्थ मेरा आज है,
व्यर्थ मेरा कल होगा |
व्यर्थ मेरी राख है ,
व्यर्थ मेरा [...]

Read Full Post »

हर बंधन से दूर , अनजान शहर में
रूह की गहराई से , मेरे जीवन में
आता है कोई , जाता है कोई
देखता हू सब कुछ … एक ख्वाब की तरह …
हवाओ के झोको में, अजीब सी ठंडक है
रातो के उजाले में भी एक दीवानापन है
समंदर की लहरे जैसे लीपटी हो बर्फ की चादर में
जीवन की कसक [...]

Read Full Post »

आजाद

हम आजाद होते तो
यह देश इक नगमा होता
संगीत झरने पशु पक्षी देते
गायक भारत जन होता
बारिश होती न कहीं बाढ़ आती
जब पानी भी आजाद होता
न घर इतने तबाह होते
न कोई घरौंदा बर्बाद होता
घर कोई टूटता भी तो
मदद सभी करते
न किसी की जाती जान
न कोई भूखा रहा होता
व्यवस्था भी इतनी होती
अगली सुबह स्वागत के लिए
नया घर तैयार [...]

Read Full Post »

अपने अश्को से आज तेरा दामन भीगा दूँ
मुझको ऐ जान मेरी इतनी इजाज़त दे दो
ना जाने किन जमानो से मैं सोया नही हूँ
अपने आँचल में छिपा लो , मुझको सुला दो
मैं अपनी तक़दीर से लड़ता अकेला थक गया हूँ
साथ मेरे आ के मुझको अब सहारा दे दो
न जाने कितनी सादियो से मैं रोया नही हूँ
ये [...]

Read Full Post »

ये अंधेरी रात है पर
अनिगनत हैं दीये यहाँ
इन दीयों की ज्योित में
जगमगाता िदख रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ ,
जगमगा लो द्वार-घर तुम
और जगत संसार अब तुम
एक लपट िदखाने इस जग को
जलता हुआ िमट रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ ,
अनिगनत इस पथ गए
पर वो निशानें अब कहाँ
उन निशानों को ढूँढता
पत्थरों से िपट [...]

Read Full Post »

धूप में किसी पेड की
छाया को कहते मित्रता,
ईश के हाथो बनी
काया को कहते मित्रता ||
ग़र निराशा आ भी जाए
मित्रता अवलम्ब है
बोझ ले विश्वास पर
यह वह अटल स्तम्भ है ||
स्वार्थ को जाने नही
वह भावना है मित्रता
मित्र के हर स्वप्न की
एक कामना है मित्रता ||
मरीचिका में सत्य का
दर्पन दिखा दे मित्रता
निश्वास में निर्वात में
कम्पन [...]

Read Full Post »

परछाईयों के इस शहर में
ढूँढता हूँ अपनी परछाई
न कोई दीप प्रज्जवलित
मेरे आगे, मेरे पीछे
मेरे दांये या कि बायें
खेल जगत का,संगीत सत्य का
नाट्य-नृत्य का,साहित्य शब्द का.
परछाईयों के इस नगर में
खोजता मैं खुद की परछाई
मन में उठती रहती है
बार-बार एक चिंगारी
पर दिये की लौ अभी तक
उसको जला नही पायी
क्या दिये में तेल [...]

Read Full Post »

बचपन में अपने गाँव में
आम की पेड़ों की छाँव में
मैं मिटटी पर लोटना चाहता था
गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था
तो माँ ने मना किया
कि तुम तो अच्छे बच्चे हो
बिगड़ जाओगे
और मैं मान गया ,
कुछ बड़ा होकर स्कूल में
मस्ती की भूल में
भागकर सिनेमा देखना चाहता था
गाली-गलौज करना [...]

Read Full Post »

सागर की अपनी विशिष्टता है
वह अनंत है, अगाध है, अथाह है
जिसमें होता असीम उर्जा का अविरत प्रवाह है .
लेकिन मैं उस नन्ही छोटी लहर को
जीवन के अधिक समीप पाता हूँ ,
वह नन्ही लहर ,जो दूर किसी छोर से जन्म पाती है
और उसी पल से नन्हें संघर्ष की कथा शुरू हो जाती है
संघर्ष यही है ‘अस्तित्व [...]

Read Full Post »

Older Posts »