अपने बीमार को ये कैसी सजा देते हैं ?
वो जब भी आते हैं, दर्द और बढा देते हैं !!
सुना है उसने छुपा रक्खी है बड़ी हुश्न की दौलत,
फ़कीर आये उनके दर पे, देखे तोः क्या देते हैं !!
बचेगा कैसे भला कोई उनकी निगाह-ए-नश्तर से,
संभलने भी नहीं देते और तीर चला देते हैं !!
दर्द-आशनाई का क्या [...]
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ग़ज़ल
Posted in ग़ज़ल, रविरंजन कुमार on August 31, 2008 | 4 Comments »