आज होकर इस जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित, जब जिया तब था अपरिचित , ख़ुद से और संसार से । जिस ज़मीं को जानता था , जिस धरम को मानता था , चाहता था मैं जिन्हें वो लोग भी अब हैं अपरिचित । अग्नि धरा आकाश से , वायु और जल की प्यास [...]
Archive for the ‘बिरजू’ Category
मैं अपरिचित
Posted in कविता, बिरजू on अगस्त 1, 2009 | 3 Comments »
आज कलम उठ जाने दो !!
Posted in कविता, बिरजू on अगस्त 1, 2009 | 2 Comments »
कई दिनों से सोये मन में आज लहर बह जाने दो , गहन विचारों के मंथन में आज कलम उठ जाने दो !! मुझे साज़ का ज्ञान नही है स्वर लहरों का भान नही है किंतु म्रदंगी की थापों पर आज कदम उठ जाने दो , गहन विचारों के मंथन में आज कलम उठ जाने [...]
कल मरना मुझे गंवारा है
Posted in कविता, बिरजू on जुलाई 24, 2009 | 2 Comments »
आज सुहानी सुबह हुई, सूरज का बुलंद सितारा है , मस्त हवा के झोंके ने, हर वृक्ष का बदन उघारा है , ऐसे मस्ती के मौसम में, जब साथ तुम्हारा प्यारा है, आज बचा लो यारो, कल मरना मुझे गंवारा है !! हर फूल की बाहें खुली हुई, भंवरों की दीवानी हैं , हर पत्ती [...]
नया सवेरा
Posted in कविता, बिरजू on अक्टूबर 19, 2008 | 1 Comment »
इस दिव्य प्रभात की बेला में एक नया सा सूरज आया है, जगमग किरणों के पथ से एक नया सवेरा लाया है !! इस प्रभात के स्वागत में तू अपनी बाहे फैला दे, आत्मसात कर इन किरणों को तू अपना तन मन पिघला दे !! अभेद्य दुर्ग के सीने पर अपना परचम लहरा दे , [...]
एक ख्वाब
Posted in कविता, बिरजू on मार्च 27, 2008 | 3 Comments »
हर बंधन से दूर , अनजान शहर में रूह की गहराई से , मेरे जीवन में आता है कोई , जाता है कोई देखता हू सब कुछ … एक ख्वाब की तरह … हवाओ के झोको में, अजीब सी ठंडक है रातो के उजाले में भी एक दीवानापन है समंदर की लहरे जैसे लीपटी हो [...]