परछाईयों के इस शहर में ढूँढता हूँ अपनी परछाई न कोई दीप प्रज्जवलित मेरे आगे, मेरे पीछे मेरे दांये या कि बायें खेल जगत का,संगीत सत्य का नाट्य-नृत्य का,साहित्य शब्द का. परछाईयों के इस नगर में खोजता मैं खुद की परछाई मन में उठती रहती है बार-बार एक चिंगारी पर दिये की लौ अभी तक [...]
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मेरी परछाई
Posted in कविता, मुदित जैन on अक्टूबर 8, 2007 | 3 Comments »