सहेज कर रखी गयी , शेल्फ की किताबों पे पड़ी हुई गर्द जैसे . या, किसी मोड़ पे इंतज़ार में उखड़ते, मील के पत्थर जैसे.आवाज़ को क़ैद करते नुक्तों की तरह किसी एक सोच से चिपक कर चुप से रह जाते हैं . “ठहरे हुए लोग” ***************
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आदत
Posted in कविता, रश्मि चौधरी on जुलाई 30, 2009 | 8 Comments »