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Archive for the ‘विकास कुमार’ Category

ठंड हो गयी है.
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया.
गर्म कमरे से बाहर निकलते ही
तुम्हारी यादें नश्तर की तरह
हड्डियों में समाने लगती हैं.
थोड़ा असर शायद हवाओं में भी होगा.
लेकिन यह मौसम वैसा नहीं है
मेरी ठंडी उंगलियाँ -
तुम्हारे होठों की गरमी के बिना
सूज गयी हैं.
देखो ना!
अब कवितायें कहाँ लिख पाता हूँ?
लिखने की कोशिश करते ही,
उँगलियों की [...]

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