ठंड हो गयी है. फिर से सर्दियों का मौसम आ गया. गर्म कमरे से बाहर निकलते ही तुम्हारी यादें नश्तर की तरह हड्डियों में समाने लगती हैं. थोड़ा असर शायद हवाओं में भी होगा. लेकिन यह मौसम वैसा नहीं है मेरी ठंडी उंगलियाँ – तुम्हारे होठों की गरमी के बिना सूज गयी हैं. देखो ना! [...]
Archive for the ‘विकास कुमार’ Category
सर्दियों का मौसम
Posted in कविता, विकास कुमार on अक्टूबर 2, 2007 | 5 Comments »