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बचपन में अपने गाँव में

आम की पेड़ों की छाँव में

मैं मिटटी पर लोटना चाहता था

गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था

तो माँ ने मना किया

कि तुम तो अच्छे बच्चे हो

बिगड़ जाओगे

और मैं मान गया ,

कुछ बड़ा होकर स्कूल में

मस्ती की भूल में

भागकर सिनेमा देखना चाहता था

गाली-गलौज करना चाहता था

तो शिक्षकों ने मना किया

कि तुम तो अच्छे बच्चे हो

बिगड़ जाओगे

और मैं मान गया ,

कालेज का दिन भी आया

मन मेरा भी भरमाया

किसी ने नही समझाया

मगर… मैं तो अच्छा बच्चा हूँ

बिगड़ जाऊंगा …

..और मैं मान गया.

– आलोक कुमार

सागर की अपनी विशिष्टता है

वह अनंत है, अगाध है, अथाह है

जिसमें होता असीम उर्जा का अविरत प्रवाह है .

लेकिन मैं उस नन्ही छोटी लहर को

जीवन के अधिक समीप पाता हूँ ,

वह नन्ही लहर ,जो दूर किसी छोर से जन्म पाती है

और उसी पल से नन्हें संघर्ष की कथा शुरू हो जाती है

संघर्ष यही है ‘अस्तित्व का संघर्ष ‘

सागर की प्रचंड शक्तियाँ जैसे उसके दमन को प्रतिबद्ध है.

किन्तु उस नन्ही की शांत प्रतिबद्धता न होती शब्दबद्ध है .

वह निःशक्त, जीवन की उस दौड़ मैं सबसे पीछे ,

फिर भी भारी हुई , उत्साह से, उमंग से ,

वह पहुँचेगी देर ही सही, किनारे तक .

इसी श्रम से वह बढती गयी ,

कभी ओझल हुई, कभी प्रकट हुई ,

आह! वह नन्ही लहर ,

किन क्रूर हाथों ने लिखा था उसका भाग्य

किन्तु प्रचंडता का वह दौड़ पार कर अंततः

उसने किनारे का पहला सुखद स्पर्श पाया

सब चिंताओं को पीछे छोड़ सफ़ेद फेन के साथ

मेरे पैरों को धोया

और बालू के कणों को मेरे शरीर पर संचित कर

स्नेह का एक नया संबंध भी जोडा ,

निश्चिंत, निष्क्रिय;

मुझसे जीवन का मूक संवाद कर रही थी

विश्राम के उन पहले क्षणों में वह

किन्तु विधि के विधान में विश्राम शब्द अपरिभाषित है .

और क्रूर लहरों की एक श्रंखला ने अपने घोष से

भयावह कम्पन्न किया

और अंत के उन क्षणों में उसने फिर संघर्ष करने का

आश्वासन दिया ,

और अंत के उन कठिन क्षणों में

जल्द मिलने का स्वर किया ,

और बालू के उस ऋण से मुक्त होने के लिए मैं

आज भी इन्तजार कर रहा हूँ.

नीरज शारदा

प्रथम वर्ष

छात्रावास-3

मान गया भगवन तेरी अदा बड़ी निराली
कहॉ था तू जब छोड़ रहा था मैं जग हरियाली
किस जुबान से कहूँ अपनी बिखरी ये दास्तान
बालू की रेत में मिला मेरा सपना आलीशान

पल-पल देता रहा इम्तिहान
कितनों की करूं मैं बखान
ये जीवन प्रतीत हुआ चलचित्र समान
दुःख ही तो था मेरा मित्र महान

सुना था जिंदगी की डगर
बरी जटिल होती हैं जिसकी सफ़र
भ्रम का ही होता हैं आवरण
जिससे पाना होता हैं निवारण

मैं ठहरा मासूम नादान
सारी बुराइयों से अनजान
जग की चपलताओं का था नहीं ज्ञान
गाता था बस एक ही गान

फूलों की महक बन जाऊँगा
अंधेरों में दीप जलाऊंगा
भूलना चाहो भी तो भूल ना पाओ
दिल में कुछ तान ऐसे सजा दूंगा

तेरे गुलशन में कुछ फूल ऐसे खिलाऊँगा
जो मुरझाना नहीं जानेंगे
वक़्त के साथ हम हो या ना हो
आप कामयाबी की पंक्तियाँ लिख जायेंगे

पर देख दुनिया की रंजिशें
जग में फैली बंदिशें
दबी ही रह गयी सारी ख्वाहिशें
करनी थी जिसकी नुमाइशें

मेरा ही अस्तित्व था दांव पर
मानो कुल्हारी परी हो पांव पर
हो गया मैं जैसे अपंग
कंचन जग हुई बदरंग

मेरा संघर्षरत जीवन
पाया क्या इसने
अटूट ग़मों का सिलसिला
जिसे हार के बाद हार ही मिला

थमी जीवन
रुकी स्पंदन
अब क्या !
जीवन या मरण !

और कहना ही पड़ा
अलविदा
ए फिजां ए चमन
तुझे अलविदा
…तुझे अलविदा

– भास्कर भारती

जिंदगी की राह-ए-गुजर में यार मेरा था पुराना
आईने ने भी कर दिया मुझसे अब तो ये बहाना

दिल दिया है जिसको उसे ये दर्द भी दे आइये
दौर-ए-जहाँ के ज़ख्म अब मुझको नहीं दिखलाइये

लाख कोशिश कर चुका, आईने को मैं भाता नहीं
बेरहम मेरा सनम है, आईना समझ पाता नहीं

आज जब रुखसत हुए हैं तो इतना तो कर ही दीजिए
कुछ रह गया है आपकी आँखों में लौटा दीजिए

आईने में आजकल कुछ भी तो दिखता है नहीं
तस्वीर मेरी आपकी आँखों से वापस कीजिए

इस जहाँ के नश्तरों को झेलना यूँ मुमकिन नहीं
गर दवा देंगे नहीं तो जहर ही दे दीजिए

– मनीष सौरभ

जंगल-गीत

अमराई की छाँव सी

सपनों के गाँव सा ,

जैसे हो सीप में मोती

समंदर में नाव सा ,

कोई गीत गाना चाहता हूँ

तुमको सुनाना चाहता हूँ ,

खुशबु हो जिसमें फैली

सोंधी सी माटी की

छाँव हो जिसपर पसरी

अरहर की टाटी सी ,

ऐसे उपवन के जैसा

गीत गाना चाहता हूँ ,

निर्झर के नाद सा

वन के संवाद सा

खामोशी जिसमें गूंजे

ऐसे आह्लाद का

कोई गीत गाना चाहता हूँ

तुमको सुनाना चाहता हूँ ,

नदिया के तट पर खड़े

बूढ़े से पेड़ का

बच्चो की सी सरलता

हँसते अधेर का ,

कोई गीत गाना चाहता हूँ

तुमको सुनाना चाहता हूँ ,

वो मीठी धुप देखो

पत्तों से छानकर

ज्यों रेशमी ताना बाना

बुनता है कोई बुनकर ,

ऐसा ही बुना हुआ

कोई गीत गाना चाहता हूँ

तुमको सुनाना चाहता हूँ .

– हर्षवर्धन

प्रथम वर्ष

छात्रावास-2

जरिया

इस दिल की भावना कोई ना समझ पाया
कि आते आते ये दर्द आँखों में भर आया
इस दर्द को पोंछने में भी एक टीसें सी उठी
बह जाने दो मुझे एक बार कहीं ये आवाज उठी
आज फिर उसे रोकने में हाथ कंपकंपाया है
इस दर्दनाक आवाज को फिर दिल की गहराईयों में दबाया है
कभी पुकारे वो आवाज दुबारा
गूँजेगा यही सवाल बार बार हमारा
सवाल ये है कि इस तरह कब तक बचेंगें इस दर्द से
दुनिया को छोड़ क्यूँ ना निकाल दें इस दर्द को मन से
और बह जाने दें इन्हें बनकर दरिया
दुनिया है ही तो भावनाएँ जताने का जरिया.

– गरिमा तिवारी

ठंड हो गयी है.
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया.
गर्म कमरे से बाहर निकलते ही
तुम्हारी यादें नश्तर की तरह
हड्डियों में समाने लगती हैं.
थोड़ा असर शायद हवाओं में भी होगा.

लेकिन यह मौसम वैसा नहीं है
मेरी ठंडी उंगलियाँ -
तुम्हारे होठों की गरमी के बिना
सूज गयी हैं.

देखो ना!
अब कवितायें कहाँ लिख पाता हूँ?
लिखने की कोशिश करते ही,
उँगलियों की ठंड
बाजुओं से होती हुई
दिल में समा जाती है.
मानों, इनका आपस में समझौता हो
ठंड बाँटने का.
और एक अनकहा सा वादा हो
दर्द साथ सहने का.

वादे से याद आया -
वो वादा, जिसकी लाश बची है सिर्फ़
जिसका एक हिस्सा तो तुमने जला दिया था
गर्मियों के आते ही.
(आखिर लाश देर सवेर बदबू जो देती है)
लेकिन दुसरे को मैंने सहेज कर रखा था.

मैं थोड़ा डरा भी.
सच!
कहीं वादे की सड़ाँध मेरी जान ना ले ले.
और फिर मैं ऊबकर उसे जला ना दूँ.
लेकिन शुक्र है.
फिर से सर्दियों का मौसम आ गया.
अब वो हिस्सा सुरक्षित है.
मैं चैन से तुम्हारी यादों में
बेचैन हो सकूँगा.

लेकिन यही ठंड तो तुम्हारे यहाँ भी होगी?
सो अपना खयाल रखना.
अगर प्रेम का अवशेष बचा हो
तो जलाना, आग सेंकना
थोड़ी सी गरमी देकर खत्म हो -
बेबस पातंगिक प्रेम और क्या चाहेगा?

विकास कुमार

लहू

लहू तो आज भी निकला है

लहू तो तब भी निकला था

जब तेरी एक झलक को,

तेरे दर पे माथा पीटा था

…पर सिर से

लहू तो तब भी निकला था

जब तुझे पाने को

आँखों से नींद उडायी थी

दर-बदर की ठोकरें खायी थी

…पर पांव से

लहू तो तब भी निकला था

आशिकों की फौज से तेरे

छिडी जब लड़ाई थी

जमके हुई हाथापाई थी

..पर हाथों से

लहू तो आज भी निकला है

इश्क की दौलत से मुझको

जब तुमने बेजार किया है

वफ़ा के जवाब में

बेवफाई का इजहार किया है

….पर आँखों से


:- आश्विन श्रीवास्तव
द्वितीय वर्ष
छात्रावास -13

मैं

नही मैं सरगम संध्या की

ना ही िनशा का साया हूँ ,

मैं एक सवेरा इस युग का

धरती की धुन्धिल काया पर

किरणे मधुर फैलाता हूँ ;

नहीं पिटारी जादू की

ना ही कोई माया हूँ ,

मैं एक सपेरा इस युग का

सर्पों का भी मन बहलाने

चंचल बीन बजाता हूँ ;

नहीं मैं कोई कल्पना कोरी

ना ही किसी का छाया हूँ ,

मैं एक चितेरा इस युग का

पकड़ तुलिका इन हाथों में

रंगों को बिखराता हूँ ;

नहीं फरिस्ता इस दुनिया का

ना ही कुछ कहने आया हूँ ,

मैं एक लुटेरा इस युग का

लूट तुम्हारे भावों को

कविता नया बनाता हूँ ।

– आलोक कुमार

जीवन के गीत लिखो !

जितनी भी पीड़ा हो, तुम हँसते मीत दिखो

संकल्पी आँखों में, सूरज के सपने ले

अँधेरी रातों में एक दिया बार दो

पलकों पर जो ठहरे, आंसू उनको भी तुम

मोती सी कीमत तो, अंतस सा प्यार दो

और नयी रीत लिखो, जीवन के गीत लिखो !

जीवन की गागर से छलक-छलक जो जाए

उस पानी की कीमत, आंकना बेमानी है

और जो समा जाए, गागर में सागर सा

मीत वही पानी तो, जीवन का पानी है

आज नयी प्रीत लिखो, जीवन के गीत लिखो !

मुक्त गगन में उड़कर, धरती पर जो आया

पंछी से पूछो तो घोंसला ही क्यूँ भाया

छेद ह्रदय में गहरे, कितने भी हो लेकिन

बांसुरी से पूछो तो मन उसका क्यूँ गाया ?

दर्द सहो और हंसो, जीवन के गीत लिखो !

हिमांशु जैन

एम. टेक.(प्रथम वर्ष )

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