सागर की अपनी विशिष्टता है
वह अनंत है, अगाध है, अथाह है
जिसमें होता असीम उर्जा का अविरत प्रवाह है .
लेकिन मैं उस नन्ही छोटी लहर को
जीवन के अधिक समीप पाता हूँ ,
वह नन्ही लहर ,जो दूर किसी छोर से जन्म पाती है
और उसी पल से नन्हें संघर्ष की कथा शुरू हो जाती है
संघर्ष यही है ‘अस्तित्व का संघर्ष ‘
सागर की प्रचंड शक्तियाँ जैसे उसके दमन को प्रतिबद्ध है.
किन्तु उस नन्ही की शांत प्रतिबद्धता न होती शब्दबद्ध है .
वह निःशक्त, जीवन की उस दौड़ मैं सबसे पीछे ,
फिर भी भारी हुई , उत्साह से, उमंग से ,
वह पहुँचेगी देर ही सही, किनारे तक .
इसी श्रम से वह बढती गयी ,
कभी ओझल हुई, कभी प्रकट हुई ,
आह! वह नन्ही लहर ,
किन क्रूर हाथों ने लिखा था उसका भाग्य
किन्तु प्रचंडता का वह दौड़ पार कर अंततः
उसने किनारे का पहला सुखद स्पर्श पाया
सब चिंताओं को पीछे छोड़ सफ़ेद फेन के साथ
मेरे पैरों को धोया
और बालू के कणों को मेरे शरीर पर संचित कर
स्नेह का एक नया संबंध भी जोडा ,
निश्चिंत, निष्क्रिय;
मुझसे जीवन का मूक संवाद कर रही थी
विश्राम के उन पहले क्षणों में वह
किन्तु विधि के विधान में विश्राम शब्द अपरिभाषित है .
और क्रूर लहरों की एक श्रंखला ने अपने घोष से
भयावह कम्पन्न किया
और अंत के उन क्षणों में उसने फिर संघर्ष करने का
आश्वासन दिया ,
और अंत के उन कठिन क्षणों में
जल्द मिलने का स्वर किया ,
और बालू के उस ऋण से मुक्त होने के लिए मैं
आज भी इन्तजार कर रहा हूँ.
नीरज शारदा
प्रथम वर्ष
छात्रावास-3