Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for अगस्त, 2009

अनंत

क्या है सघन मेघों के उस पार,
नही जानता
हो सकता है अंधकार ,
या हो सकते हैं सूर्य हजार,
यही मानता

सत्य छुपा
हो उस चोटी पर,
जो हो मेघों से भी ऊपर
बादल से छनती किरण थाम लूँ ,
उस चोटी को लक्ष्य मान लूँ

विकट सरल बाधाएं चीर कर,
पहुंचूंगा मैं जब उस चोटी पर
मैं निश्चय ही यह पाऊंगा ,
मैं भी एक
सूर्य बन जाऊंगा ।।

ऋषभ जैन


Read Full Post »

कही से आया हवा का झोंका
तेरी ही यादो से भर गया है
गुजर के कितने करीब से फिर
वो कल हमें दूर कर गया है
……………………….
वो खुशनुमा सा दर्द देता
निरीह मासूम प्यार अब भी
मेरे हृदय में लगे है जैसे
अभी कोई घाव कर गया है
……………………
रहू अभी चुप या पूछ लू  मैं
घिरा हुआ हूँ मैं उलझनों से
जो दिन तेरे साथ थे बिताने
मेरा वो हिस्सा किधर गया है
………………………….
कई दिनों से खबर नहीं है
मैं सोचता  हूँ  के आजमा लू
मेरे ह्रदय में वो प्यार जिन्दा
है या तेरे साथ ही मर गया है
……………………….
समझ सको तो तुम्ही बताओ
सजा उसे या मुझे मिली है
वो चैन से सो गया है लेकिन
मेरा तो आगन बिख़र  गया है
…………………………..
कभी तो तू भी ठहर लिया
ऐ वक़्त बेवक्त क्यों जा रहा है
अकेले चल के मै थक गया हूँ
जरा सा लम्बा सफ़र गया है……………..
…………………….
कही से आया हवा का झोंका
तेरी ही यादो से भर गया है…………

पवन  राय

Read Full Post »

कुछ चीजें होती है, जिनका अनजाने में ही इंतज़ार किया करते है,
कोई खामोशी से तो कोई ख़ुशी से, अपना इज़हार किया करते है…
कुदरत की इस कृति की बड़ी अजीबोगरीब दास्ताँ है,
इसे समझ पाना कभी मुश्किल, तो कभी बहुत आसान है….

जैसे “पानी की बूँद”, कहने को तो सिर्फ एक मामूली बूँद होती है,
ये बहरूपिये की तरह है, जो किसी को पहचान में नहीं आती है…
धरती की प्यास बुझाने के लिए, बरस पड़ती है आसमान से,
लहलहाते खेतों के लिए, बन के आती है सोमरस के रूप में…

समूचे गगन में हो संग हवाओं के, ये ठुमकती रहती है,
सूरज की किरणों के साथ खेल होली, ये इन्द्रधनुष बना देती है…
बारिश में पेडों के पत्तों पर, ये मोती बनकर बिखर जाती है,
फूल के अंगों पर सजकर, ये दुल्हन उसे बना देती है…

शराब की बोतल में लुढ़ककर, ना जाने कितने मयखाने सजाये है,
गम में डूबे हुए को अपना सहारा देकर, अनगिनत देवदास बनाये है…
कभी दुःख में शामिल होकर, आँख से आंसू बनकर निकल पड़ती है ,
तब आसान नहीं होता रोक पाना इसे, जब आँखे ज्वालामुखी बन जाती है…

ये उभरती है हीरे की तरह चमकती हुई, जब माथे पर पसीना बन के ,
लगता है जैसे अपनी मेहनत से जीत कर ज़ंग, हम बन गए हो बादशाह जगत के…
इतना कुछ होने पर भी हमेशा खोई रहती है किसी गुमनामी के अँधेरे में,
जैसे ये मिटा देती है अपना वजूद, डूब कर समुन्दर की गहराइयों में…

– कन्हैया लाल

Read Full Post »

नमस्कार !!
मैं नवीन आप सबका धोनी के स्वयंवर में स्वागत करता हूँ !!

जग के सारे बालों में
रही निराली शान है ;
वह भारत का कप्तान है,
हमारा धोनी महान है

इसके छक्के सबसे न्यारे
ये तो क्रिकेट की जान है ;
गांगुली के खून का प्यासा
पर युवराज का प्राण है
वह भारत का कप्तान है,
हमारा धोनी महान है ।।

यह तो हुआ धोनी का साधारण परिचय, अब क्या आप जानते हैं कि उन्हें लड़की कैसी चाहिएउन्होंने ख़ुद कहा ,

दिल के करीब रखूंगा मैं
मुझे चाहिए एक ऐसी हूर,
सबकुछ जिसपे लुटा दूँ अपना
मुझे चाहिए एक ऎसी नूर

और उसका निजी सहायक होने के नाते दूँ कि वह बहुत ही Romantic हैं :p
भाई ग़लत मत समझिये, उनकी बातों से ऐसा लगता है !
और अब सभी लड़कियों को बता देता हूँ कि उनसे शादी करने के इतने फायदे हैं :-

रहने को अच्छा बंगला
घूमने को AC गाड़ी
ऎसी फैसिलिटी बोलो…..और कहाँ मिलेगी?

ऊंचालंबा कद इनका
छाए हैं मोडेलिंग में भी
ऐसी सेक्सी सूरत बोलो….और कहाँ मिलेगी?

स्पोर्ट्स बाइक पर घुमायेगा
फाइवस्टार में डिनर देगा
ऐसी अमीर पार्टी बोलो…..और कहाँ मिलेगी?

पैसों से नहाओगी
जो चाहोगी पाओगी
ऐसी मस्त जिन्दगी बोलो…..और कहाँ मिलेगी?

तो सभी युवतियों से अनुरोध है कि वो स्वयंवर के लिए जल्द से जल्द नामांकन करवायें, ” बकरा हलाल होना चाहता है, बस कसाई की जरूरत है । ”

नवीन जांगीर
प्रथम वर्ष

PS: ये लेख Freshi रचनात्मक लेखन में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है, नवीन को मेरी तरफ़ से ढेरसारीशुभकामनाएं , आगे भी वाणी और IIT के लिए ढेर सारी रचना करेंगे ऐसी आशा और विश्वास है


Read Full Post »

उसमें अनंत गहराई है,
है व्याकुलता, तन्हाई है,
ढूंढ सको तो ढूंढ लो ,
एकसोताउसमें कहीं बहता है
कवि तो ख़ुद एक कविता है

दुनिया से बेगाना है,
दुनियादारी से अनजाना है,
अव्यक्त, उलझे भावों को,
वो कागज़ पर लिख देता है
कवि तो ख़ुद एक कविता है

शब्दों की भी सीमायें हैं,
कविता में कुछ अंश ही आयें हैं,
सागर से निकली इन बूंदों में भी,
कितना कुछ वो कहता है ,
कवि तो ख़ुद एक कविता है

उन शब्दों को हम ना ताकें,
गर उस हलचल को पहचान सके
क्या कहना आख़िर वो चाहता है,
उन अर्थों को हम जान सकें,
बेचैनी, उमंग नीरवता को भी,
वो लफ्जों में कह देता है
कवि तो ख़ुद एक कविता है

कविता तो एक माध्यम है,
आख़िर तो कवि को पढ़ना है
कलम की इस सीढ़ी से,
उसके ह्रदय तक चढ़ना है
वहाँ पहुंचोगे तो पाओगे
एक कलकल करती सरिता है
कवि तो ख़ुद एक कविता है

ऋषभ जैन
प्रथम वर्ष का छात्र

Read Full Post »

आज होकर इस जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित,
जब जिया तब था अपरिचित , ख़ुद से और संसार से ।

जिस ज़मीं को जानता था , जिस धरम को मानता था ,
चाहता था मैं जिन्हें वो लोग भी अब हैं अपरिचित ।

अग्नि धरा आकाश से , वायु और जल की प्यास से ,
था बना कण कण जो मेरा , आज वो कण भी अपरिचित ।

मिट्टियों में खेलता था , उघरे बदन मैं दौड़ता था ,
कल्पनाओं का समंदर , आज वो बचपन अपरिचित ।

माँ की ममता ने सिखाया , गुरुजनों ने भी बताया ,
ढाई अक्षर से बना , वो प्रेम भी अब है अपरिचित ।

भूल और संज्ञान में , जो किए मैंने करम ,
उनका फल ले कर जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित ।

Read Full Post »

कई दिनों से सोये मन में
आज लहर बह जाने दो ,
गहन विचारों के मंथन में
आज कलम उठ जाने दो !!

मुझे साज़ का ज्ञान नही है
स्वर लहरों का भान नही है
किंतु म्रदंगी की थापों पर
आज कदम उठ जाने दो ,
गहन विचारों के मंथन में
आज कलम उठ जाने दो !!

अंतर्मन के कोलाहल में
सुलगालो एक चिंगारी
फ़िर उस चिंगारी के ऊपर
आज पवन बह जाने दो ,
गहन विचारों के मंथन में
आज कलम उठ जाने दो !!

Read Full Post »