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Archive for the ‘आलोक कुमार’ Category

उस हसीना की यादों में पूरी रात जागा था ,
और सुबह होते ही झटपट class भागा था ;
lecture में बैठेबैठे, मैं सोने लगा था,
अपने आप पर नियंत्रण खोने लगा था

मगर प्यारे prof ने,ये होने नहीं दिया
पलभर के लिए भी मुझे सोने नहीं दिया ;
lecture से लौटकर बिस्तर पर सो गया,
उसके हसीं सपनों में फ़िर से खो गया

नींद खुली मेरी तो बारह बज रहे थे,
lan-ban होने के लक्षण लग रहे थे;
झटपट में मैंने अपना GPO खोला,
तभी किसी ने PA पर आकर बोला:


पप्पू का जन्मदिन है, सब बंप्स लगाने जाओ,
उसके बाद जितना चाहो, कैंटीन में जाकर खाओ !”

पेट में चूहे कूद रहे थे भूख के कारण
GPO को छोड़ किया रुद्र रूप धारण;
फिर जाकर पप्पू को जमकर लात लगाया,
मस्ती करके कमरे में तीन बजे आया

ये IIT की जिन्दगी है,
नींद का नहीं यहाँ ठिकाना;
रोजरोज ये रात्रिजागरण,
हे ईश्वर! तू मुझे बचाना


जागतेजागते सोच रहा था कल के नुकसान पर ,
बड़ी मुश्किल से आया एकएक चीज ध्यान पर;
Quiz छूटा, Lab छूटा, एक class छूट गया,
औरवाणीका एकमुलाकातछूट गया

रोहित नाराज़ होगा, भावना नाराज़ होगी ,
पता नहीं रश्मिजी मुझसे क्या कहेगी ;
फिर मैंने सोचा कि चुप तो नहीं रहूँगा
मुझसे वे पूछेंगे तो झूठमूठ कह दूँगा :


Quiz था ,Lab था, एक presentation था,
एक नहीं तीनतीन Assignment submission था;
ये IIT की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या?
साँस लेने तक की, फ़ुरसत नहीं यहाँ ;
थोडी फ़ुरसत मिली, बस यहीं रहा हूँ ;
आप सबको अपनी ये कविता सुना रहा हूँ ।।

आलोक कुमार-

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संत जेवियर मुंबई के सालाना जलसे मल्हार की हिंदी प्रतियोगिता में आई.आई.टी. की टीम प्रथम आयी. याद के तौर पर मैं उसे वाणी पर डाल रहा हूँ. आप पढ़कर ये भी अनुमान लगा सकते हैं कि छात्रों के बीच की प्रतियोगिता का स्तर क्या होता है .

विषय: आगरा, ताजमहल बनाते कर्मचारियों के बीच का वार्तालाप
समय : दो घंटे

यमुना की उन्मत्त लहरें, तट से जा टकराती है
गाती है कल-कल ध्वनि में,चलती है बल खाती है;
नीचे लहरों का खेल अमर,ऊपर चाँद की चमक प्रखर
एक पुरुष पुलकित मन में ,घूम रहा है उस तट पर ;

पुरुष: पूनम की रातों का जगमग नजारा
चकोरी का चंदा को होगा इशारा
कि रोशन तू अबसे अकेला ना होगा
जमीं पर भी चंदा बनाया गया है .
दूसरा पुरुष: (उसकी एकाग्रता भंग करते हुए )
वाह रे! तेरे स्वप्न निराले, अनगिन-अनगिन रंगों वाले
काश कभी ऐसा हो पाए , चंदा कहीं धरा आ जाए .
हैं मजदूर, हाथ फावडा, काम है अपना महल बनाना
सपने मुगलों को दे दो तुम, उनका काम है स्वप्न सजाना.

पहला मजदूर :
क्यूँ ना मैं ये सपने देखूं ,मेरी मेहनत, मेरा पसीना
जब-जब तोडूं संगमरमर ये, चौडा होता मेरा सीना.
दूसरा मजदूर :
पेट कहाँ भरता सपनों से, सपने नहीं खिलाते रोटी
यहाँ जलानी होती भट्टी, भूख है मिटती तब बच्चों की;
प्रेम की बात कहाँ करते हो,प्रेम कहाँ टिकता भूखों में
रात-दिन हम करते श्रम हैं, तब घर में चूल्हे जलते हैं ..
पहला मजदूर :(सोचते हुए )
सही कहा है तुमने भाई, देखी हमने खूब खुदाई
सपने शोभे राजमहल को, हमने तो बस कुटिया पाई.
दूसरा मजदूर: (उसका समर्थन करते हुए )
राजमहल में है संगमरमर और अपने मिट्टी के घर ..
पहला मजदूर:(भावुक होते हुए )
प्रेम यहाँ हीरों तुलता है ,प्रेम का भी यहाँ मोल है
मैं ताज नहीं बनवा सकता पर प्रेम मेरा अनमोल है ;
ताज बिखर जायेगा एक दिन ,प्रेम नहीं रह जायेगा
मुझ गरीब का प्रेम अमर है, कभी ना तोला जायेगा.
दूसरा मजदूर :(भावुक हो जाता है )
ताज अगर गिर जाए एक दिन , यादें सब मिट जायेंगी
अमिट छाप मेरे हाथों की , पत्थर पर रह जायेगी ;
हाथ ही मेरा जगन्नाथ है, करता है जग का निर्माण
मेरे हाथों की शक्ति का ,ये ताजमहल होगा प्रमाण ..

नेपथ्य से :
” सोचा था किसने इन करों को शासक यूँ कटवा देगा ,
ताजमहल की सुन्दरता में, शामिल है कई चीखें भी “

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शायद कुछ छूट गया है;

दर्द दिया जो तूने मुझको
भूल गया मैं उन सबको पर,
दिल से उनका था अपनापन
वो अपनापन टूट गया है ,
शायद कुछ छूट गया है;

तेरे गम को भूल गया मैं
खंडहरों में महल बनाकर,
पर कंकर-पत्थर से पिटकर
भोला दिल टूट गया है ,
शायद कुछ छूट गया है;

लहू से लथपथ दिल था मेरा
घाव सुखाया उसे तपाकर,
यादों का उनसे था बंधन
अब बंधन टूट गया है ,
शायद कुछ छूट गया है .

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ये अंधेरी रात है पर
अनिगनत हैं दीये यहाँ
इन दीयों की ज्योित में
जगमगाता िदख रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ ,

जगमगा लो द्वार-घर तुम
और जगत संसार अब तुम
एक लपट िदखाने इस जग को
जलता हुआ िमट रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ ,

अनिगनत इस पथ गए
पर वो निशानें अब कहाँ
उन निशानों को ढूँढता
पत्थरों से िपट रहा हूँ
आज मैं कुछ िलख रहा हूँ .

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बचपन में अपने गाँव में

आम की पेड़ों की छाँव में

मैं मिटटी पर लोटना चाहता था

गिल्ली-डंडा खेलना चाहता था

तो माँ ने मना किया

कि तुम तो अच्छे बच्चे हो

बिगड़ जाओगे

और मैं मान गया ,

कुछ बड़ा होकर स्कूल में

मस्ती की भूल में

भागकर सिनेमा देखना चाहता था

गाली-गलौज करना चाहता था

तो शिक्षकों ने मना किया

कि तुम तो अच्छे बच्चे हो

बिगड़ जाओगे

और मैं मान गया ,

कालेज का दिन भी आया

मन मेरा भी भरमाया

किसी ने नही समझाया

मगर… मैं तो अच्छा बच्चा हूँ

बिगड़ जाऊंगा …

..और मैं मान गया.

— आलोक कुमार

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मैं

नही मैं सरगम संध्या की

ना ही िनशा का साया हूँ ,

मैं एक सवेरा इस युग का

धरती की धुन्धिल काया पर

किरणे मधुर फैलाता हूँ ;

नहीं पिटारी जादू की

ना ही कोई माया हूँ ,

मैं एक सपेरा इस युग का

सर्पों का भी मन बहलाने

चंचल बीन बजाता हूँ ;

नहीं मैं कोई कल्पना कोरी

ना ही किसी का छाया हूँ ,

मैं एक चितेरा इस युग का

पकड़ तुलिका इन हाथों में

रंगों को बिखराता हूँ ;

नहीं फरिस्ता इस दुनिया का

ना ही कुछ कहने आया हूँ ,

मैं एक लुटेरा इस युग का

लूट तुम्हारे भावों को

कविता नया बनाता हूँ ।

— आलोक कुमार

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