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Archive for the ‘आशीष पालीवाल’ Category

मै छोड चुका
तो छोड चुका

प्रिये प्रेम के इस पथ पर
हमको चलना था साथ मगर
हो साथ तेरा हो साथ मेरा
ये राहे साथ नही देती

तन्हा राहो से दर्द भरा
संबंध निभाने से अच्छा

मै तोड चुका
तो तोड चुका

जैसे-जैसे सांसे घटती
ये राहे बंटती जाती है
नाकाम मेरी नज़रे होती
दूरी यूं बढती जाती है

अब किसे याद कि
कभी तुम्हारा
हाथ भी थामा था हमने

वादो के शव पर आस बहा
मुंह मोड चुका
तो मोड चुका

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ओ रे नीरे !

ओ रे नीरे !
आज मचल जा कि
अब अंतस में तेरे
भाव की लहरें उठेंगी
स्वप्न के संचार होंगे

और इस नीरस धरा पर
पुष्प हर रंग का खिलेगा

ना थी मूरत
था सनाटा
आज बज जाए मंजीरे
ओ रे नीरे !

स्वप्न की दुनिया का
सच में
आज मन
संचार होगा

आज सोयेगा अँधेरा
प्रेम का उजियार होगा

आज सूखे जलधरो से
भी यहाँ पानी गिरेगा

झूम तू खुशियों में लेकिन
थोडा धीरे
ओ रे नीरे !

पतझरो में झर गया
हर पात वृक्षों से मगर
अब वास आया है वसन्तो का
अभी न शोक कर

कि अब हवाए
शीत की लहरों को अपने संग लिए
फैला रही है दूर तक सुरभि

बदन में
उठ रहे कम्पन है
जैसे ही छुआ इस
वात ने है

एक उत्सव जग में है
और एक मेरे मन में है
एक उत्सव कर रही है
पवन ये
मुझको घेरे
ओ रे नीरे !

मन ही केवल खुश नहीं है
देखो-देखो इन विहग के कलरवो को
आज ये आकाश सारा
नाप देंगे

देखो पातो की विवशता
बन्धनों में बंद है
पर आज फिर भी
चेष्टा उड़ने की है
सो मचलते है
संग हवाओं के |

लुभाते मन को मेरे
ओ रे नीरे !!

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संत जेवियर मुंबई के सालाना जलसे मल्हार की हिंदी प्रतियोगिता में आई.आई.टी. की टीम प्रथम आयी. याद के तौर पर मैं उसे वाणी पर डाल रहा हूँ. आप पढ़कर ये भी अनुमान लगा सकते हैं कि छात्रों के बीच की प्रतियोगिता का स्तर क्या होता है .

विषय: आगरा, ताजमहल बनाते कर्मचारियों के बीच का वार्तालाप
समय : दो घंटे

यमुना की उन्मत्त लहरें, तट से जा टकराती है
गाती है कल-कल ध्वनि में,चलती है बल खाती है;
नीचे लहरों का खेल अमर,ऊपर चाँद की चमक प्रखर
एक पुरुष पुलकित मन में ,घूम रहा है उस तट पर ;

पुरुष: पूनम की रातों का जगमग नजारा
चकोरी का चंदा को होगा इशारा
कि रोशन तू अबसे अकेला ना होगा
जमीं पर भी चंदा बनाया गया है .
दूसरा पुरुष: (उसकी एकाग्रता भंग करते हुए )
वाह रे! तेरे स्वप्न निराले, अनगिन-अनगिन रंगों वाले
काश कभी ऐसा हो पाए , चंदा कहीं धरा आ जाए .
हैं मजदूर, हाथ फावडा, काम है अपना महल बनाना
सपने मुगलों को दे दो तुम, उनका काम है स्वप्न सजाना.

पहला मजदूर :
क्यूँ ना मैं ये सपने देखूं ,मेरी मेहनत, मेरा पसीना
जब-जब तोडूं संगमरमर ये, चौडा होता मेरा सीना.
दूसरा मजदूर :
पेट कहाँ भरता सपनों से, सपने नहीं खिलाते रोटी
यहाँ जलानी होती भट्टी, भूख है मिटती तब बच्चों की;
प्रेम की बात कहाँ करते हो,प्रेम कहाँ टिकता भूखों में
रात-दिन हम करते श्रम हैं, तब घर में चूल्हे जलते हैं ..
पहला मजदूर :(सोचते हुए )
सही कहा है तुमने भाई, देखी हमने खूब खुदाई
सपने शोभे राजमहल को, हमने तो बस कुटिया पाई.
दूसरा मजदूर: (उसका समर्थन करते हुए )
राजमहल में है संगमरमर और अपने मिट्टी के घर ..
पहला मजदूर:(भावुक होते हुए )
प्रेम यहाँ हीरों तुलता है ,प्रेम का भी यहाँ मोल है
मैं ताज नहीं बनवा सकता पर प्रेम मेरा अनमोल है ;
ताज बिखर जायेगा एक दिन ,प्रेम नहीं रह जायेगा
मुझ गरीब का प्रेम अमर है, कभी ना तोला जायेगा.
दूसरा मजदूर :(भावुक हो जाता है )
ताज अगर गिर जाए एक दिन , यादें सब मिट जायेंगी
अमिट छाप मेरे हाथों की , पत्थर पर रह जायेगी ;
हाथ ही मेरा जगन्नाथ है, करता है जग का निर्माण
मेरे हाथों की शक्ति का ,ये ताजमहल होगा प्रमाण ..

नेपथ्य से :
” सोचा था किसने इन करों को शासक यूँ कटवा देगा ,
ताजमहल की सुन्दरता में, शामिल है कई चीखें भी “

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रातो को मैं सपने तेरे
बुनता हूँ
मन ही मन मैं यादे तेरी गुनता हूँ
रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ …….

तेरी यादे तेरी बातें
मन के अपने प्यारे नाते
हर साँस मे तेरा नाम बसा
मैं ख़ुद की धड़कन सुनता हूँ

रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ…..

बैठ मैं तारे गिनता रहता
ख़ुद ही हस्त ख़ुद से कहता
दर्द भरे इस जीवन से
अब मैं खुशिया चुनता हूँ

रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ……

चाँद भी अब हस्ता है मुझपे
पागल मुझको कहता है
क्या खैर चकोर दीवाने की
जो उसकी धुन मे रहता है

रैना मैं दीवानों जैसे
प्यार मे सर को धुनता हूँ….
रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ……

क्या ख़बर शमा को आशिक की
क्या ख़बर उसे दीवाने की
क्या लेना उसको ख़ाक हुई
हस्ती से एक परवाने की

मैं हस्ती अप्नी ख़ाक किए
तेरे प्रेम के कांटे चुनता हूँ

रातो को मैं सपने तेरे बुनता हूँ………

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मैं मूक कवि हूँ ,मूक कवि
मैं कह नही सकता भावो को
इसलिये उकेरता रहता हूँ
कागज़ पर डगमग नावों को ||

मैं सुन सकता हूँ ,सुनता हूँ
तरह-तरह की बातो को
कितने पंछी के कलरव को
आंधी मे डालो-पातो को||

चुपचाप मैं बस सुनता रहता
जो जगती मुझको सुनाती है
कभी,वीणा की मधुर तान
कभी,घृणित शोर बन जाती है||

जितने है मुँह उतनी बाते
एक अवसर आने की देरी
और अवसर आते ही देखो
कैसे बजती है रणभेरी ||

एक प्रतिस्पर्धा,समर,युद्ध
छिड़ जाता है लोगो मैं तब
कोई कितना शोर मचाता है
कोई कितनी बात बनाता है||

कैसी है ये दुनिया तेरी
जीते नही जीने देती है
करती रुख अँधेरी गलियाँ
पीते नही पीने देती है ||

दो ह्रदयों का मेल अगर हो
हानि बता जग तेरी क्या है?
क्यों बांटे है तू ह्रदयों को
बांटे ये बहुतेरी क्या है?

चटखारे लेकर पर-पीड़ा
सुनी -सुनाई जाती है
जिन बातो को ढकना हो
वाही बात बताई जाती है||

“कैसा जीवन जीते है वे
जिनको वाणी-वरदान मिल
उनसे तो अच्छा मैं गूंगा
जिसको गूंगापन दान मिला ”

||आशीष ||

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धूप में किसी पेड की
छाया को कहते मित्रता,
ईश के हाथो बनी
काया को कहते मित्रता ||

ग़र निराशा आ भी जाए
मित्रता अवलम्ब है
बोझ ले विश्वास पर
यह वह अटल स्तम्भ है ||

स्वार्थ को जाने नही
वह भावना है मित्रता
मित्र के हर स्वप्न की
एक कामना है मित्रता ||

मरीचिका में सत्य का
दर्पन दिखा दे मित्रता
निश्वास में निर्वात में
कम्पन जग दे मित्रता ||

एक अजब संबंध है
एक धीरता है मित्रता,
हास्य से सींची हुई
गम्भीरता है मित्रता ||

ग़र कदम थकते कभी तो
मित्रता तो पास है,
जीत का विश्वास भर दे
एक अनूठी आस है ||

हर ख़ुशी के ओष्ठ पर
जो गीत वह है मित्रता,
प्रेम के सुर में ढला
संगीत ऐसी मित्रता ||

सांस जो रूकती कभी तो
दम अगर साहस भरे ,
हार की उम्मीद हो और
सच हो सपनो से परे,
हाथ थामे जीत का
विश्वास देगी मित्रता
अपने ही सामर्थ्य तक
हर श्वास देगी मित्रता ||

ग़र कही इतना अनोखा
प्रेम मिल जाये कभी,
भूल कर भी खो ना देना
साकार ऐसी मित्रता ||

आशीष पालीवाल
प्रथम वर्ष

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