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Archive for the ‘कहानी’ Category

End-sem का समय था और अचानक ही IIT के छात्रों ने google समूह पर एक-एक पंक्ति डालना शुरु किया जिसने एक कहानी का निर्माण ले लिया…आइये इस मजेदार कहानी जिसके लेखक २०-२५ रहे होंगे का आनंद उठाते हैं, दो छात्रों की लिखी हुई पंक्ति के बीच एक (………) संकेत है :

End-sem के एक दिन पहले मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था कि तभी अचानक …….मुझे बगल के कमरे से आती कुछ अजीब सी आवाजें सुनाई दी……मैं तुरंत भागता हुआ वहाँ गया तो देखा कि……कमरे में तो ताला लगा हुआ था…… कोई कैसे बंद कमरे में अपना computer खुला छोड़ सकता है ?……. मेरे दिमाग में एकाएक विचारों की आंधी चली और मुझे वहाँ हैवानी और परलौकिक शक्तियों का आभास हुआ……लेकिन एक विज्ञान के छात्र होते हुए मुझे इस बात पर विश्वास करना मुश्किल था, मगर जब उस दरवाजे के नीचे से एक के बाद एक कागज़ बाहर आने लगे तो मुझे अहसास हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है….. साहस करके मैंने उन सारे कागजों में से एक को उठाया और धीरेधीरे पढ़ना शुरू कर दिया…….मैंने अभी कुछ ही शब्द पढ़े थे कि अचानक मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया, मैंने पलटकर देखा तो……. एक सुंदर सी कन्या श्वेत वस्त्रों में वहाँ पर खड़ी थी…….लड़कों के hostel में ये कन्या कौन थी, कहाँ से आयी थी, ये जानने के लिए मैं आतुर हो उठा था…….मैं इतना सोच ही रहा था कि सहसा एक अद्भुत पत्ता कहीं से गिरा………. उस पत्ते पर एक संदेश लिखा था …… मैंने उन अक्षरों को पढने और समझने की बहुत कोशिश की………..पर मुझे इसे पढने में कोई मज़ा नहीं रहा था, बारबार मेरा दिल उस कन्या से बात करने के लिए मचल रहा था , और आख़िर मैंने पूछ ही लिया…….. हे सुन्दरी!! तुम कोई स्वप्न हो या वास्तविकता? …..उत्तर में उस कन्या ने बस इतना कहा कि ही मैं पूर्ण रूप से वास्तविक हूँ और ही मैं पूर्ण रूप से स्वप्न…… मैंने उसकी उलझी हुई बातों से तनिक ध्यान हटाकर उस पत्ते में लिखे संदेश को पढ़ा…… उसमें लिखा था कि वो युवती जो तुम्हारे सामने खड़ी है, अरे यह क्या ? उस पत्ते से तो शब्द गायब हो रहे थे……पत्ते के गायब हो रहे शब्दों के साथ मेरे मन की कौतूहलता बढ़ रही थी, कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा था……. मेरी उस दशा को देख वह कन्या ठहाका मारकर हंसने लगी और बोली…..अरे मैं उतनी ही वास्तविक हूँ जितना कि पत्ते पर लिखा हुआ एकएक शब्द ! मैं अवाक कभी पत्ते को तो कभी कन्या को देख रहा था…….मुझे अपने अतीत की वो सारी घटनाएं याद रही थी जिनका संबंध इस चमत्कारिक घटना से था………मुझे स्मरण हो आया कि मैं तो स्वर्गलोक की अप्सरा रम्भा का पुत्र हूँ और मृत्युलोक में मैं तो एक शाप के कारण अवतरित हुआ हूँ……बात उस समय की है जब स्वर्ग पर अधिकार करने के लिए देवासुर संग्राम चल रहा था……असुरों का पलडा भारी था और देवता हार रहे थे……उस संग्राम में मैं भी हिस्सा लेना चाहता था, मगर छोटे होने के कारण मुझे वहाँ जाने से रोका जा रहा था……… परंतु मैं उस समर में जौहर दिखाने को आकुल था और मैंने एक युक्ति ढूंढ निकाली…….मैंने अपनी मायावी शक्तियों से अपनी काया को बलशाली बना लिया……. किंतु प्रकृति के प्रतिकूल होने के कारण मेरे इस कार्य से ब्रह्माजी कुपित हो उठे और मुझे अगले जन्म में मृत्युलोक में जन्म लेने का अभिशाप दे दिया……शाप के प्रकोप से बचने के लिए मैं भागा और भागतेभागते एक नदी के पास पहुँचा जहाँ कुछ गंधर्व कन्याएं जलक्रीडा कर रही थी…… उन कन्याओं में गन्धर्वलोक की राजकुमारी चित्रलेखा भी थी …….मैं वहाँ से आगे बढ़ सका और चित्रलेखा को अपलक निहारता रहा……… गंधर्व कन्याएं जलक्रीडा छोड़कर मेरे समीप गयी और मुझे घेर ली, डर से मेरा हाल बुरा हो रहा था……. मगर तभी चित्रलेखा मेरे समीप आयी और मुझे propoge कर दी……..मैं असमंजस में पड़ गया और उसे ब्रह्माजी के शाप के बारे में विस्तार से बताया…….सब कुछ सुनकर उसने मुझसे एक वादा किया था और उसी वादे को पूरा कने के लिए आज मेरे कमरे के समीप प्रकट हुई थी…….अब मुझे सबकुछ याद गया था और मैं उस गंधर्वकुमारी को स्पर्श करने जा रहा था……… तभी मेरा room-mate कमरे में study-room से वापस गया और मुझे आँखें खोल सोया देख जोरजोर से झकझोड़ दिया और मेरे सपनों का शीशमहल पलभर में ही चकनाचूर हो चुका था…. मुझे याद गया था कि कल endsem है और मेरा पूरा syllabus बाक़ी है………. और एक बार फिर End-sem के एक दिन पहले मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था । ।

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