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Archive for the ‘गौरव’ Category

मेरा मन

हो जाऊँ कभी मैं तेज (बिजली) सा
सूरज की तेज किरण सा
घुमु मैं कहीं भी
हो घर मेरा मधुवन सा
राज करू जहां पर मैं
कहलाऊँ मैं भगवन सा
जो चाहू वो मिल जाए
वो … जाए वो जी जाए
झूमु कभी मैं सावन सा
कभी सोचता हूँ दोडू भागु
कस्तूरी के लिए जैसे
वन में कोई हिरन सा
कभी कहीं खो जाऊँ मैं
आसमा के तारो जैसे चमकू
कभी मैं टिम टिम सा
कभी होते हुए भी नहीं दिखु
चन्दा सा कोई अमावस का
कभी कुबेर बनू मैं तो
कभी पतझर के वन सा
भूखा रहूँ मैं
पैदल चलू मैं
धीमा हो जाऊं मैं
पल पल सा
चाहत है या कोई समंदर
मन क्या मेरा चितवन सा.

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आजाद

हम आजाद होते तो
यह देश इक नगमा होता
संगीत झरने पशु पक्षी देते
गायक भारत जन होता
बारिश होती न कहीं बाढ़ आती
जब पानी भी आजाद होता
न घर इतने तबाह होते
न कोई घरौंदा बर्बाद होता
घर कोई टूटता भी तो
मदद सभी करते
न किसी की जाती जान
न कोई भूखा रहा होता
व्यवस्था भी इतनी होती
अगली सुबह स्वागत के लिए
नया घर तैयार होता
होता यह तब जब …
जब भ्रस्ताचार न होता
जब भारतवासी आजाद होता
पर हम आजाद नहीं है
हम आजाद होते तो
वन्दे शताब्दी पर न इतना विवाद होता
न ही कोई झंडा विवाद होता
न कभी गुजरात जैसे दंगे होते
सब में भाई वाद होता
जब भारत आजाद होता
पर हम आजाद नहीं है
हम आजाद होते तो
कोई आपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए
न रोज जीता
न रोज (जीकर ) मरता
न कोई आपनी आत्मा की सुनने में शर्म करता
कुछ भी होता
न ये कविता होती
न इस कविता का कवि
मैं होता
गर हमारा देश आजाद होता – गौरव

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