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Archive for the ‘दीपशिखा वर्मा’ Category

 इस दिव्य प्रभात की बेला में 
 इक नया सा सूरज आया है ,
 जग मग किरणों के पथ से 
 इक नया सवेरा लाया है |

 यु तो कई दिन आते हैं ,
 पर जाने क्यों आज 
 आसमा का नीचे 
 इक नरम नरम सी छाया है,
 इक गरम गरम सी छाया है|||

 इक अलसाई करवट ले रहा था, 
 कि रश्मि की सिकीं उँगलियों ने छुआ|
 चक्षु में धुप की छीटें छिटक कर, 
 पैगाम दिया -उठो की चकमक सवेरा हुआ|

 मैं  उठा ,मुँह धोकर 
 रसोई की और पाँव किये, 
 महक के अनुरूप इक अच्छे 
 नाश्ते की कामना लिए,
 पर ये क्या आज गृह लक्ष्मी रोज़ की 
 तरह कुछ बुदबुदा नहीं रही!
 शिकायतों के कर्कश अलाप सुना नहीं रही!
 मैं मुस्कुराया और चुप रहा ,
 मन के अन्दर अचरच का एक  दरिया बहा, 
 सोचा आज दिन कुछ अजीब है ,
 या शायद रोशन मेरे नसीब  हैं| 

 अब घर छोड़ ,में डगर पर था ,
 ना फिजाओं में बस ,मोटर कार के हार्न का शोर,
 ना ही दूषित धुंए का दम घोटता हिलोर ,
 शांति से इसे भी पचा लिया, 
 फिर अचरच की उचालती गेंद को मन में कहीं दबा लिया| 

 अब,कार्यालय में प्रवेश हुआ,
 ये सन्नाटे का इस माहोल में कैसे समावेश हुआ ?
 अब दिमाग कुछ चकराने लगा,
 मेरे अचरच का बाँध टूट बिखर जाने लगा ,
 ये असंभव का गगन संभव की ज़मी से कैसे टकराने लगा| 

 मैं चिल्ला कर उठ बैठा ,
 अरे देखा!बिस्तर पर था लेटा,
 ओह ,तो ये वो मेरा स्वप्नों का दिवस है 
 जो मैं जीना चाहता  हूँ ,
 जो पेय कभी सतयुग में बंटता था 
 उसे आज कलयुग में पीना चाहता हूँ||||||||||||

-दीपशिखा वर्मा

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