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Archive for the ‘पवन राय’ Category

कही से आया हवा का झोंका
तेरी ही यादो से भर गया है
गुजर के कितने करीब से फिर
वो कल हमें दूर कर गया है
……………………….
वो खुशनुमा सा दर्द देता
निरीह मासूम प्यार अब भी
मेरे हृदय में लगे है जैसे
अभी कोई घाव कर गया है
……………………
रहू अभी चुप या पूछ लू  मैं
घिरा हुआ हूँ मैं उलझनों से
जो दिन तेरे साथ थे बिताने
मेरा वो हिस्सा किधर गया है
………………………….
कई दिनों से खबर नहीं है
मैं सोचता  हूँ  के आजमा लू
मेरे ह्रदय में वो प्यार जिन्दा
है या तेरे साथ ही मर गया है
……………………….
समझ सको तो तुम्ही बताओ
सजा उसे या मुझे मिली है
वो चैन से सो गया है लेकिन
मेरा तो आगन बिख़र  गया है
…………………………..
कभी तो तू भी ठहर लिया
ऐ वक़्त बेवक्त क्यों जा रहा है
अकेले चल के मै थक गया हूँ
जरा सा लम्बा सफ़र गया है……………..
…………………….
कही से आया हवा का झोंका
तेरी ही यादो से भर गया है…………

पवन  राय

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हे मृगनयनी हे कमल बदन
मै क्या दू  तुमको संबोधन
अ़ब तुम ही मेरा जीवन हो
तुझमे बसते है प्राण प्रिये

प्रथम मिलन की वह वेला
आँखों से क्या तुमने खेला
तेरे नयनो के तीक्ष्ण बाण
मैंने अपने दिल पे झेला

छरहरा बदन मदमस्त चाल
लगाती जैसे लचकती डाल
तेरी सुंदर काया से
मन चितवन मेरा निढाल

जबसे तुमको देखा है
खोया अपनी पहचान प्रिये
……………………….

कोपल जैसा कोमल तन
अधखिली कली सा रंग रूप
कंधो पे काले केश जाल
खेले है जैसे छाव धूप

सम गुलाब अधरज तेरे
व अधरों पे मुस्कान मंद
जिनका  वर्णन करने में
है महा काव्य बन गए छ न्द

अति उत्तम अद्वैत चक्षु
लगते मधुके प्याले है
प्रकृति ने तेरे अंग अंग
ये किस सांचे में ढाले है

तुम सुन्दरता का सार तत्त्व
तुम यौवन का अभिमान प्रिये
………………………… .

पलको का उठ के गिर जाना
धीरे से तेरा मुस्काना
अंगुली में लिपटा कर आंचल
तेरा इठलाना शरमाना

सखियों ने भी छेड़ा होगा
प्रश्नों से घेरा होगा
कारन क्या सिल गए होठ
बंधन तेरा मेरा होगा
बन गए स्नेह के रिश्ते से
क्या तू अब भी अनजान प्रिये

…………………………
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तेरे चिंतन से मेरा
गुंजित मन स्नेहानुराग
तुझमे ही सारा सुख पाया
पनपा मन में जग से विराग

दूर सही पर पूरक है
तुम प्राची मै किरण पुंज
देखो इतना न इतराओ
मै भवर और तुम पुष्पकुंज

मै हूँ उठाता स्वर कोकिल
तुम वीणा की तान प्रिये

…………………
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यह प्रणय निवेदन है मेरा
तुम इसको स्वीकार करो
बिखरे खुशियों के मोती को
संजो कर मुक्ता हार करो

वो धुली चांदनी की राते
वो खुद से की मीठी बाते
एकाकी में जो भी बीता
हो साथ उन्हें हम दोहरा दे

मै एक अधूरा किस्सा हू
और तू है मेरी कर्णधार

जीवंत करो मेरा जीवन
पहना बाहों का कंठ हार

नवजीवन की श्रृष्टि में ही
है जीवन का सम्मान प्रिये

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तुम लगते केवल मेरे हो
तुमसे बढ़ता मेरा लगाव
छलक रहे इन शब्दों में
ढाले है मैंने क्षतज भाव
किस भांति जताऊं  मै तुमको
जो दर्द ह्रदय में आता है
मन विरह व्यथा में रोता है
नित आँखों से बह जाता है

मन व्यथा घाव ना बन जाये
तुम रखना इतना ध्यान प्रिये

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अनजाने सुख की इच्छा मे
भटके मन मूरख अनुगामी
भौतिक सुख उन्मुख जग अँधा
ना महिमा प्रेम की पहचानी
अक्षय पावन प्रेम भाव
जनपूजन का अधिकारी है
यह दो आखर का शब्द प्रेम
सच सभी ज्ञान पर भरी है
तुम सभी विधा का गूढ़ तथ्य
तुम जग का सारा ज्ञान प्रिये

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हे प्रिये नहीं यह पत्र महज
अभिव्यक्ति है मेरे मन का
कर रहा समर्पित प्रेम यज्ञ मे
हवानाहुती इस जीवन का

उठ रही यज्ञ की यह ज्वाला
ले जायेगी सन्देश मेरा
मै रात अमावस अँधेरी
बन के आओ राकेश मेरा

तुझको अर्पित सब तन मन धन
जानू ना विधि विधान प्रिये
तेरे हाथो मे हृदय दिया
करना इसका सम्मान प्रिये
अब तुम ही मेरा जीवन हो तुझमे बसते है प्राण प्रिये……..

पवन राय
RESEARCH SCHOLAR
DEPARTMENT OF CHEMISTRY
IIT BOMBAY

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