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Archive for the ‘भास्कर भारती’ Category

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!

बंधुओं,
यह सर्वविदित हैं की बीते दिन मानवता को शर्मसार करने वाले कुकृत्य पुनः दुहराए गए….दिल्ली की गलियों में फिर किलकारियां गूंजी ,फिर कोई अनाथ हुआ ,फिर कोई दिल सुन्न हुआ होगा ..तो क्या यह सिलसिला चलता ही रहेगा …नहीं ये थमेगा और इसे रोकेंगे हम सब…बस एक ज्वाला की दरकार हैं …उसी ज्वाला की एक इकाई स्वरुप प्रस्तुत मेरी ये रचना…..

ओ प्रफुल्लित मनुवंशजों !!

निद्रा की गोद में
सुसुप्त जीवन तुम्हारा
क्यों नहीं बेधती
अपनों की ही करुण वेदना
तुम चेतनाहीन तो नहीं
फिर क्यों नहीं थमती
विचारों की तकरार

झंकृत करती मानवता
की सुशोभित दर्प को
वो मासूम पल
क्यों होते बदनाम

विनाश की फर्श पर
मुरझाता जीवन
जागो मेरे बांकुरों
कर दो पल समर्पित
दूसरों के खातिर

शुभ्रमयी दिवसों की चाह में
परम की जन्नत को
उतार ला ज़मीं पर
कह सके खुदा भी
बन्दे तू ही मानव हैं
विसरित जिसकी नभ में
कालजयी अखंड गाथा

एक शामियाना
निर्मित ऐसा कर
देवराज भी आ ठहरे
कुछ ऐसा कर
ओ मानवता के मीत
– भास्कर भारती

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मान गया भगवन तेरी अदा बड़ी निराली
कहॉ था तू जब छोड़ रहा था मैं जग हरियाली
किस जुबान से कहूँ अपनी बिखरी ये दास्तान
बालू की रेत में मिला मेरा सपना आलीशान

पल-पल देता रहा इम्तिहान
कितनों की करूं मैं बखान
ये जीवन प्रतीत हुआ चलचित्र समान
दुःख ही तो था मेरा मित्र महान

सुना था जिंदगी की डगर
बरी जटिल होती हैं जिसकी सफ़र
भ्रम का ही होता हैं आवरण
जिससे पाना होता हैं निवारण

मैं ठहरा मासूम नादान
सारी बुराइयों से अनजान
जग की चपलताओं का था नहीं ज्ञान
गाता था बस एक ही गान

फूलों की महक बन जाऊँगा
अंधेरों में दीप जलाऊंगा
भूलना चाहो भी तो भूल ना पाओ
दिल में कुछ तान ऐसे सजा दूंगा

तेरे गुलशन में कुछ फूल ऐसे खिलाऊँगा
जो मुरझाना नहीं जानेंगे
वक़्त के साथ हम हो या ना हो
आप कामयाबी की पंक्तियाँ लिख जायेंगे

पर देख दुनिया की रंजिशें
जग में फैली बंदिशें
दबी ही रह गयी सारी ख्वाहिशें
करनी थी जिसकी नुमाइशें

मेरा ही अस्तित्व था दांव पर
मानो कुल्हारी परी हो पांव पर
हो गया मैं जैसे अपंग
कंचन जग हुई बदरंग

मेरा संघर्षरत जीवन
पाया क्या इसने
अटूट ग़मों का सिलसिला
जिसे हार के बाद हार ही मिला

थमी जीवन
रुकी स्पंदन
अब क्या !
जीवन या मरण !

और कहना ही पड़ा
अलविदा
ए फिजां ए चमन
तुझे अलविदा
…तुझे अलविदा

— भास्कर भारती

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