Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘मनीष सौरभ’ Category

अपने अश्को से आज तेरा दामन भीगा दूँ
मुझको ऐ जान मेरी इतनी इजाज़त दे दो
ना जाने किन जमानो से मैं सोया नही हूँ
अपने आँचल में छिपा लो , मुझको सुला दो

मैं अपनी तक़दीर से लड़ता अकेला थक गया हूँ
साथ मेरे आ के मुझको अब सहारा दे दो
न जाने कितनी सादियो से मैं रोया नही हूँ
ये आंसू सूख न जाए अब पलको पे कहीं

मैं तन्हाई यो से आज कल डरता बहुत हूँ
तुम् मेरा हाथ थाम के फिर चलना सिखा दो
की अब रास्तों मे मेरे अँधेरा ही अँधेरा
तुम् अपने प्रेम के दीपक से रौशनी सजा दो

मैं पतझर के काँटों से उलझा हुआ हूँ
दो फूल अब मेरे दामन में गिरा दो
मैं अपनी ज़िंदगी अब सौप्ता हूँ हाथों मे तेरे
मार दो मुझको कि या वापस जिला दो

अपने अश्को से आज तेरा दामन भीगा दूँ
मुझको जान मेरी इतनी इजाज़त दे दो
ना जाने किन जमानो से मैं सोया नही हूँ
अपने आँचल में छिपा लो , मुझको सुला दो

Advertisements

Read Full Post »

जिंदगी की राह-ए-गुजर में यार मेरा था पुराना
आईने ने भी कर दिया मुझसे अब तो ये बहाना

दिल दिया है जिसको उसे ये दर्द भी दे आइये
दौर-ए-जहाँ के ज़ख्म अब मुझको नहीं दिखलाइये

लाख कोशिश कर चुका, आईने को मैं भाता नहीं
बेरहम मेरा सनम है, आईना समझ पाता नहीं

आज जब रुखसत हुए हैं तो इतना तो कर ही दीजिए
कुछ रह गया है आपकी आँखों में लौटा दीजिए

आईने में आजकल कुछ भी तो दिखता है नहीं
तस्वीर मेरी आपकी आँखों से वापस कीजिए

इस जहाँ के नश्तरों को झेलना यूँ मुमकिन नहीं
गर दवा देंगे नहीं तो जहर ही दे दीजिए

— मनीष सौरभ

Read Full Post »