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Archive for the ‘मुदित जैन’ Category

परछाईयों के इस शहर में

ढूँढता हूँ अपनी परछाई

न कोई दीप प्रज्जवलित

मेरे आगे, मेरे पीछे

मेरे दांये या कि बायें

खेल जगत का,संगीत सत्य का

नाट्य-नृत्य का,साहित्य शब्द का.

परछाईयों के इस नगर में

खोजता मैं खुद की परछाई

मन में उठती रहती है

बार-बार एक चिंगारी

पर दिये की लौ अभी तक

उसको जला नही पायी

क्या दिये में तेल कम है?

या फिर बाती शुष्क रही है ?

क्यूँ बार-बार उठती चिंगारी

भीतर दीप जला नहीं पाती .

जिस दिये की लौ में

ढूँढता मैं खुद की परछाई

विश्वास पर अटूट है मन में

दीपक अब जलेंगे सारे

मेरे आगे , मेरे पीछे

मेरे दांये और बायें,

खेल जगत के,संगीत सत्य के

नाट्य-नृत्य के,साहित्य शब्द के,

किया प्रथम ‘मुदित’ सृजन है

‘मुदित’ होगी मेरी परछाई

परछाईयों के इस शहर में

बस दिखेंगी मेरी परछाई ..

मुदित जैन

प्रथम वर्ष

छात्रावास-3

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