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Archive for the ‘रश्मि चौधरी’ Category

सहेज कर रखी गयी ,

शेल्फ की किताबों पे पड़ी हुई गर्द जैसे .


या, किसी मोड़ पे इंतज़ार में उखड़ते,

मील के पत्थर  जैसे.

आवाज़ को क़ैद करते नुक्तों की तरह

किसी एक सोच से चिपक कर

चुप से रह जाते हैं .


“ठहरे हुए लोग”


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